लीलावती ट्रस्ट विवाद: बॉम्बे हाईकोर्ट ने HDFC बैंक के CEO शशिधर जगदीशन के खिलाफ रिश्वतखोरी का केस किया रद्द, शिकायत को बताया ‘जवाबी हमला’

बॉम्बे हाईकोर्ट ने HDFC बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO शशिधर जगदीशन को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज रिश्वतखोरी के मामले और FIR को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने इस शिकायत को बैंक द्वारा 65 करोड़ रुपये से अधिक की बकाया राशि वसूलने की कार्यवाही के खिलाफ एक “जवाबी हमला” (counterblast) करार दिया है।

विवाद की शुरुआत HDFC बैंक द्वारा ‘स्प्लेंडर जेम्स लिमिटेड’ (Splendour Gems Ltd) के खिलाफ शुरू की गई वसूली प्रक्रिया से हुई थी। यह कंपनी मेहता परिवार द्वारा संचालित है और इस पर बैंक का 65.22 करोड़ रुपये बकाया था। इस कार्यवाही के बाद, बांद्रा स्थित लीलावती अस्पताल चलाने वाले लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट ने अपने प्रतिनिधि प्रशांत मेहता के माध्यम से एक शिकायत दर्ज कराई।

ट्रस्ट का आरोप था कि शशिधर जगदीशन ने ट्रस्टी चेतन मेहता से 2.05 करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी। शिकायतकर्ता का दावा था कि वसूली प्रक्रिया के दौरान मिली एक डायरी से संकेत मिलता है कि यह भुगतान वित्तीय सलाह और ट्रस्ट के प्रशासन पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद के लिए किया गया था। इस आधार पर, मई 2025 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पुलिस जांच के आदेश दिए, जिसके बाद 31 मई 2025 को धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात की धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई थी।

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शशिधर जगदीशन ने इस FIR को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि यह आपराधिक मामला पूरी तरह से बैंक की वैध वसूली कार्यवाही का परिणाम है, जो 65 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट के कारण शुरू की गई थी।

दूसरी ओर, ट्रस्ट ने आरोप लगाया कि चेतन मेहता और अन्य ने अवैध रूप से ट्रस्ट पर नियंत्रण हासिल कर लिया और इसके धन का उपयोग निजी मुकदमों के लिए किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि ट्रस्ट के संस्थापक किशोर मेहता की 2024 में मृत्यु बैंक अधिकारियों द्वारा बनाए गए दबाव के कारण हुई थी।

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जस्टिस एम. एस. कर्णिक और जस्टिस एन. आर. बोरकर की खंडपीठ ने मामले के दस्तावेजों की जांच के बाद पाया कि आपराधिक जांच का कोई ठोस आधार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह शिकायत ट्रस्ट के पूर्व और वर्तमान ट्रस्टियों के बीच चल रहे “गंभीर मनमुटाव और कटु संबंधों” का नतीजा है।

बैंक की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा:

“हमारी राय में, यह शिकायत शुरू की गई वसूली कार्यवाही के खिलाफ एक जवाबी हमले के अलावा और कुछ नहीं है। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री शिकायतकर्ता के दावों की जांच को बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं ठहराती है।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वित्तीय संस्थान ऋण की वसूली के लिए कार्यवाही शुरू करने के लिए बाध्य हैं। कोर्ट ने किशोर मेहता की मृत्यु के लिए बैंक अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराने के दावे को भी खारिज कर दिया और कहा कि ड्यूटी के दौरान की गई कानूनी कार्यवाही के लिए अधिकारियों पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता।

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बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि इस FIR को जारी रखना “अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा, क्योंकि यह शिकायत नेक नीयती (bona fide) से नहीं की गई थी, बल्कि ट्रस्ट की आंतरिक लड़ाई का हिस्सा थी।

हाईकोर्ट ने जगदीशन की याचिका स्वीकार करते हुए FIR और मजिस्ट्रेट कोर्ट के जांच के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी संज्ञान में लिया कि HDFC बैंक अभी भी ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) के समक्ष बकाया राशि की वसूली के लिए कानूनी प्रयास जारी रखे हुए है।

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