SARFAESI एक्ट के तहत वैधानिक उपाय मौजूद होने पर अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका विचारणीय नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक सुरक्षित संपत्ति (Secured Asset) का कब्जा भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और उसके सब-लेसी को वापस करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि जब पक्षकारों ने पहले ही SARFAESI एक्ट, 2002 की धारा 17 के तहत उपलब्ध वैधानिक विकल्प का उपयोग कर लिया है और मामला ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) के समक्ष लंबित है, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय (Maintainable) नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद लखनऊ के फैजाबाद रोड स्थित शेखपुर कसैला की खसरा संख्या 131 की भूमि से संबंधित है। इस संपत्ति को ऋण के बदले सुरक्षित संपत्ति के रूप में रखा गया था, जिस पर बकाया वसूली के लिए SARFAESI एक्ट के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी।

BPCL इस संपत्ति पर लीज का दावा कर रही थी, जबकि मेसर्स अरोरा ऑटो सेंटर वहां सब-लेसी के रूप में पेट्रोल पंप संचालित कर रहा था। ऋण चूक (Default) के बाद, सुरक्षित लेनदार (फीनिक्स एआरसी प्राइवेट लिमिटेड) ने धारा 14 के तहत आदेश प्राप्त कर 27 अक्टूबर 2025 को संपत्ति का भौतिक कब्जा ले लिया। इसके बाद हुई नीलामी में मेसर्स वाहेगुरु प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड सबसे ऊंची बोली लगाने वाला बनकर उभरा।

BPCL और उसके सब-लेसी ने इन कार्यवाहियों को चुनौती देते हुए DRT लखनऊ के समक्ष कई ‘सिक्योरिटाइजेशन एप्लीकेशन’ (S.A.) दायर की थीं। इन वैधानिक कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान ही उन्होंने हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर कर दीं। 28 नवंबर 2025 को एक एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने 24 घंटे के भीतर कब्जा वापस करने का अंतरिम आदेश जारी कर दिया था, जिसे वर्तमान अपीलों में चुनौती दी गई।

पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ताओं (नीलामी खरीदार और वित्तीय संस्थान) ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के नियमों और रोस्टर के अनुसार रिट याचिका एकल न्यायाधीश के समक्ष विचारणीय नहीं थी। उनका मुख्य तर्क यह था कि चूंकि प्रतिवादी पहले ही धारा 17 के तहत DRT की शरण ले चुके थे, इसलिए वे एक ही राहत के लिए समानांतर रिट याचिका दायर नहीं कर सकते।

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इसके विपरीत, प्रतिवादियों (BPCL और अरोरा ऑटो सेंटर) ने दलील दी कि रिकवरी की पूरी प्रक्रिया ‘शून्य’ (Void ab initio) थी क्योंकि यह मृत व्यक्तियों (गारंटर) के खिलाफ शुरू की गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि BPCL के लीज अधिकारों की अनदेखी की गई और परिसर में स्थित टैंकों में मौजूद पेट्रोलियम उत्पादों से सुरक्षा का खतरा पैदा हो सकता है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

डिवीजन बेंच ने रिट याचिकाओं की पोषणीयता की जांच दो मुख्य आधारों पर की: क्षेत्राधिकार और वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता। हाईकोर्ट ने पाया कि रिट याचिकाएं डिवीजन बेंच के अधिकार क्षेत्र में थीं, न कि एकल न्यायाधीश के। एकल न्यायाधीश द्वारा मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी करने को लेकर बेंच ने कहा:

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“रिट याचिका BPCL द्वारा लगभग उन्हीं राहतों के लिए दायर की गई थी, जो पहले से ही DRT लखनऊ के समक्ष लंबित थीं… एकल न्यायाधीश ने कब्जा बहाल करने का अंतरिम आदेश पारित किया, जो वह नहीं कर सकते थे।”

सुप्रीम कोर्ट के ‘बॉम्बे मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम गोकक पटेल वोल्कार्ट लिमिटेड’ मामले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा:

“यह एक ऐसा मामला है जहां न केवल वैकल्पिक उपाय मौजूद है, बल्कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में उस उपाय का लाभ भी उठाया है। जब वैधानिक प्राधिकरण के समक्ष अपील लंबित थी, तब रिट याचिका पर विचार नहीं किया जाना चाहिए था।”

कोर्ट ने ‘फीनिक्स एआरसी (पी) लिमिटेड बनाम विश्व भारती विद्या मंदिर’ मामले का भी जिक्र किया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि SARFAESI एक्ट के तहत की गई कार्रवाई के खिलाफ निजी वित्तीय संस्थानों के विरुद्ध अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका आमतौर पर विचारणीय नहीं होती है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एकल न्यायाधीश को उन तथ्यों और साक्ष्यों पर अपनी राय नहीं देनी चाहिए थी, जो पहले से ही DRT के विचाराधीन थे।

निर्णय

हाईकोर्ट ने सभी विशेष अपीलों को स्वीकार करते हुए 28 नवंबर 2025 के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने मूल रिट याचिकाओं (Writ C No. 11298 of 2025 और Writ C No. 11302 of 2025) को अपोषणीय करार देते हुए खारिज कर दिया।

कोर्ट ने यह रियायत दी कि BPCL और उसके सब-लेसी पेट्रोलियम नियमों के तहत उचित अधिकारियों से संपर्क कर सुरक्षित रूप से ईंधन निकलवा सकते हैं। साथ ही यह भी नोट किया गया कि अपीलकर्ताओं को प्रतिवादियों द्वारा अपने ढांचे (Structures) हटाने पर कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते यह DRT की कार्यवाही के अधीन हो।

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पक्षकारों के वकील:

  • अपीलकर्ताओं के लिए: श्री सुदीप सेठ (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री पुष्कर श्रीवास्तव, श्री सत्येंद्र कुमार राय, श्री एल.पी. मिश्रा, श्री प्रशांत कुमार, श्री दीपांशु दास और श्री सर्वेश कुमार तिवारी।
  • प्रतिवादी-BPCL के लिए: श्री जयदीप नारायण माथुर (वरिष्ठ अधिवक्ता) और श्री आशीष चतुर्वेदी।
  • प्रतिवादी-मेसर्स अरोरा ऑटो सेंटर के लिए: श्री ध्रुव माथुर (वरिष्ठ अधिवक्ता) और सुश्री ऐश्वर्या माथुर।
  • राज्य के लिए: श्री निशांत शुक्ला (अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता)।
  • आवेदक-श्रीमती कृष्णा देवी के लिए: श्री अनुराग श्रीवास्तव।

केस विवरण:

केस का नाम: मेसर्स वाहेगुरु प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड लखनऊ बनाम मेसर्स अरोरा ऑटो सेंटर लखनऊ और 12 अन्य

केस संख्या: स्पेशल अपील संख्या 420/2025

बेंच: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी

तारीख: 24 अप्रैल 2026

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