परिस्थितियों पर आधारित मामलों में सह-आरोपियों के इकबालिया बयान और संदिग्ध बरामदगी दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने साल 2013 के एक सनसनीखेज हत्याकांड में दोषी ठहराए गए सात लोगों की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने माना कि कोई भी आपराधिक दोषसिद्धि केवल संदेह, पुलिस हिरासत में लिए गए कानूनन अस्वीकार्य इकबालिया बयानों या पुलिस द्वारा बिना किसी स्वतंत्र गवाह के दिखाई गई बरामदगी के आधार पर टिकी नहीं रह सकती। जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने आरोपियों की अपीलों को स्वीकार करते हुए निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोप साबित करने के लिए आवश्यक कड़ियों को जोड़ने में पूरी तरह विफल रहा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला 29 मई 2013 की रात करीब 10:30 बजे का है, जब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक घर के भीतर टीवी देख रहे एक 14 वर्षीय किशोर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। शुरुआती लिखित शिकायत के अनुसार, तीन मोटरसाइकिल सवार हमलावर जबरन घर में घुस आए और किशोर पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। शिकायतकर्ता ने शुरुआत में आपसी रंजिश के संदेह में कुछ स्थानीय लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी।

हालांकि, पुलिस जांच के आगे बढ़ने के साथ ही शुरुआती नामजद आरोपियों को जांच से बाहर कर दिया गया। पुलिस ने मुखबिरों की सूचना और हिरासत में लिए गए बयानों के आधार पर एक नई कहानी तैयार की, जिसमें एक पुलिस इंस्पेक्टर को इस हत्याकांड का मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। अभियोजन पक्ष का दावा था कि उक्त पुलिस इंस्पेक्टर कथित तौर पर शिकायतकर्ता की बेटी के प्रति एकतरफा लगाव रखता था और उसके पड़ोस के एक अन्य युवक के साथ संबंधों का विरोध करता था। पुलिस का आरोप था कि उस युवक को हत्या के झूठे मामले में फंसाने और लड़की के परिवार को डराने के लिए पुलिस इंस्पेक्टर ने भाड़े के शूटरों के जरिए इस वारदात को अंजाम दिलाया था।

ट्रायल कोर्ट ने 28 फरवरी 2020 को इस मामले में सात आरोपियों को आईपीसी की धारा 302/120-बी, 449, 34 और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया था।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह से पुलिस द्वारा तैयार किए गए फर्जी और कानूनन अस्वीकार्य बयानों पर आधारित था। उन्होंने कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि घटना के मुख्य चश्मदीद गवाहों (शिकायतकर्ता और उनके बेटे) ने अदालत में गवाही के दौरान आरोपियों को पहचानने से साफ इनकार कर दिया था। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने दलील दी कि अपराध में इस्तेमाल की गई कारों, मोटरसाइकिलों और हथियारों की बरामदगी केवल पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में दिखाई गई थी, जिसका कोई भी स्वतंत्र गवाह नहीं था। उन्होंने फॉरेंसिक रिपोर्ट की एक बड़ी विसंगति को भी उजागर किया कि मौके से मिले खाली कारतूस तो बरामद पिस्तौल से मेल खाते थे, लेकिन मृतक के शरीर और घटनास्थल से मिली गोलियां उस हथियार से चली ही नहीं थीं।

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दूसरी ओर, राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पूरी तरह से मजबूत हैं। उन्होंने दावा किया कि आरोपियों की निशानदेही पर की गई बरामदगी और खाली कारतूसों का पिस्तौल से मिलान होने की फॉरेंसिक रिपोर्ट आरोपियों की संलिप्तता को साबित करने के लिए पर्याप्त है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया और साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले शरद बिरधीचंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला देते हुए परिस्थितियों के आधार पर दोषसिद्धि के पांच स्वर्ण सिद्धांतों (‘पंचशील’) को रेखांकित किया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ‘आरोपी दोषी हो सकता है’ से ‘आरोपी ही दोषी है’ के बीच की दूरी को तय करने में विफल रहा। कोर्ट ने टिप्पणी की:

निश्चित रूप से, यह एक प्राथमिक सिद्धांत है कि किसी आरोपी को दोषी ठहराए जाने से पहले यह साबित होना चाहिए कि वही दोषी है, न कि केवल यह कि वह दोषी हो सकता है। ‘हो सकता है’ और ‘ही है’ के बीच का मानसिक फासला बहुत लंबा होता है जो अस्पष्ट अनुमानों को निश्चित निष्कर्षों से अलग करता है।

1. हिरासत में लिए गए इकबालिया बयानों की अस्वीकार्यता

कोर्ट ने पुलिस हिरासत के दौरान दर्ज किए गए बयानों पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस के सामने दिया गया बयान कानूनन साक्ष्य नहीं माना जा सकता:

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…एक सह-आरोपी के इकबालिया बयान को पुख्ता और बुनियादी साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता। इसका उपयोग केवल तभी किया जा सकता है जब अदालत अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंच रही हो और उसे केवल अपने उस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए एक अतिरिक्त सहारे की आवश्यकता महसूस हो। आपराधिक मुकदमों में नैतिक धारणा या गंभीर संदेह के आधार पर सजा देने की कोई गुंजाइश नहीं होती है।

2. संदिग्ध और त्रुटिपूर्ण बरामदगी

बरामदगी के संबंध में कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए। वाराणसी में जिस घर से कार और पिस्तौल बरामद दिखाई गई थी, उस घर के मालिक ने अदालत में शत्रु गवाह घोषित होने के बाद साफ कहा कि पुलिस ने उससे केवल सादे कागजों पर दस्तखत करवाए थे और कोई बरामदगी उसकी मौजूदगी में नहीं हुई थी। कोर्ट ने माना कि आरोपियों की निशानदेही पर बरामदगी की अनिवार्य प्रक्रिया का पूरी तरह से उल्लंघन किया गया था।

3. बैलिस्टिक विसंगति और साक्ष्यों के रख-रखाव में देरी

कोर्ट ने पाया कि बरामद पिस्तौल और मृतक के शरीर से निकली गोलियों में कोई मिलान नहीं था। इसके साथ ही, हथियार बरामद होने के बाद उसे फॉरेंसिक लैब भेजने में पुलिस द्वारा आठ दिनों की अकारण देरी की गई, जिससे साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका पैदा होती है।

4. केस डायरी का गलत इस्तेमाल और धारा 313 के बयान

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने केस डायरी (धारा 172 सीआरपीसी) में दर्ज बयानों को सीधे साक्ष्य मानकर भारी भूल की। इसके अतिरिक्त, मुख्य आरोपी द्वारा धारा 313 सीआरपीसी के तहत पूछे गए सवालों पर चुप्पी साधने या उचित स्पष्टीकरण न देने को दोषसिद्धि का आधार बनाए जाने पर कोर्ट ने साफ किया कि आरोपी की चुप्पी का उपयोग अभियोजन पक्ष के कमजोर साक्ष्यों की कड़ियों को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता।

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5. साजिश और मकसद का अभाव

हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के एकतरफा प्रेम प्रसंग की कहानी को काल्पनिक और पूरी तरह से निराधार माना। लड़की ने अदालत में आरोपियों के साथ किसी भी तरह के संबंध से स्पष्ट इनकार किया था।

संगीन मामलों में अदालतों पर बनने वाले दबाव और केवल संदेह के आधार पर कहानियां गढ़ने की प्रवृत्ति पर कोर्ट ने चेतावनी दी:

…जब बात बर्बर अपराधों की हो, तो मानवीय स्वभाव मजबूत संदेहों के आधार पर कहानियां बुनने के लिए बहुत उत्सुक रहता है… ‘हो सकता है कि यह सच हो’ और ‘इसे सच होना ही चाहिए’ के बीच एक लंबी दूरी होती है जिसे किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने से पहले अभियोजन पक्ष को स्पष्ट, ठोस और अकाट्य साक्ष्यों से ही तय करना होता है।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस कड़ी जोड़ने में असमर्थ रहा है। कोर्ट ने सभी सात आरोपियों की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उन्हें बरी करने का आदेश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संजय राय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 475 वर्ष 2020 (क्रिमिनल अपील संख्या 671, 672 और 673 वर्ष 2020 के साथ)
पीठ: जस्टिस राजेश सिंह चौहान, जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
निर्णय की तिथि: 05 जून 2026

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