विदेशी अदालतों में लंबित जटिल बाल कस्टडी विवादों के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका उचित नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने मां को फैमिली कोर्ट जाने का निर्देश दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने सिंगापुर में अपने पिता के साथ रह रही चार साल की बच्ची की कस्टडी के लिए एक भारतीय मां द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि समानांतर विदेशी कोर्ट की कार्यवाही और अत्यधिक विवादित तथ्यों से जुड़े जटिल बाल कस्टडी विवाद, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मिलने वाले असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मां को निर्देश दिया कि वे बच्ची की कस्टडी और उससे मिलने के अधिकार (विजिटेशन राइट्स) के दावों के लिए सक्षम फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं।

विवाद की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता (मां) और दूसरे प्रतिवादी (पिता) की मुलाकात 2016 में सिंगापुर में हुई थी और दोनों ने 18 नवंबर, 2016 को गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया था। विवाह के बाद दोनों सिंगापुर चले गए और वहां अपना वैवाहिक जीवन शुरू किया। 28 सितंबर, 2021 को सिंगापुर में उनकी बेटी का जन्म हुआ, जो एक भारतीय नागरिक है। 12 मार्च, 2024 को बच्ची में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) का पता चला था।

मां का आरोप था कि बेटी के जन्म के बाद से ही पिता और उसके परिवार ने उनके और बच्ची के साथ लगातार क्रूरता, उपेक्षा और मानसिक प्रताड़ना की, जिससे बच्ची के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा। मां ने यह भी दावा किया कि पिता शराब का आदी है और उसने उनके साथ शारीरिक हमला, यौन हिंसा और बंधक बनाने जैसी हरकतें कीं। मां का आरोप था कि पिता ने दिसंबर 2024 में सुलह और बच्ची के बेहतर इलाज के बहाने उन्हें सिंगापुर बुलाकर धोखा दिया और वहां उनका पासपोर्ट और बच्ची के यात्रा दस्तावेज जब्त कर लिए।

अपनी सुरक्षा के डर से मां ने सिंगापुर पुलिस से संपर्क किया, जिन्होंने 25 दिसंबर, 2024 को उनकी वहां से रवानगी सुनिश्चित कराई। हालांकि, यात्रा दस्तावेज न होने के कारण उन्हें बच्ची को वहीं छोड़ना पड़ा। भारत लौटने के बाद, वे जुलाई 2025 में फिर से सिंगापुर गईं और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई व सुरक्षा आदेश प्राप्त किया। लेकिन उनका आरोप है कि पिता ने 6 अगस्त, 2025 को बच्ची को सिंगापुर में ही किसी अज्ञात स्थान पर छुपा दिया और मां का रेजिडेंसी पास भी रद्द करवा दिया ताकि उन्हें वापस भारत डिपोर्ट किया जा सके।

समानांतर कार्यवाही और तथ्यों को छुपाना

पिता ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया और याचिकाकर्ता द्वारा महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाने पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। पिता ने कोर्ट को बताया कि मां ने सिंगापुर के ‘फैमिली जस्टिस कोर्ट’ में चल रही तलाक और कस्टडी की कार्यवाही तथा वहां पारित आदेशों की जानकारी हाईकोर्ट से छिपाई है, जबकि ये कार्यवाही भारत में रिट याचिका दायर करने से पहले ही शुरू हो चुकी थी।

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पिता ने 27 जनवरी, 2025 को सिंगापुर में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें दोनों पक्षों ने भाग लिया। 25 नवंबर, 2025 को, सिंगापुर के फैमिली जस्टिस कोर्ट ने मां की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने भारत के अधिकार क्षेत्र के पक्ष में सिंगापुर की कार्यवाही पर रोक लगाने और बच्ची को भारत ले जाने की अनुमति मांगी थी।

सिंगापुर की कोर्ट ने पाया था कि बच्ची, जो एडीएचडी (ADHD) से भी पीड़ित है, वहां बेहतर विकास कर रही है, स्कूल जा रही है और उसे सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल (एनयूएच) में विशेष थेरेपी व उपचार मिल रहा है। सिंगापुर कोर्ट ने माना था कि बच्ची के सर्वोत्तम हित में यथास्थिति बनाए रखना जरूरी है। इसके साथ ही पिता ने यह भी रेखांकित किया कि मां ने दिल्ली की फैमिली कोर्ट में पहले ही गार्डियनशिप याचिका दायर कर रखी थी, जो दर्शाता है कि उनके पास पहले से ही अन्य कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें

मां की ओर से वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि चूंकि दोनों का विवाह हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था, इसलिए कस्टडी विवादों पर केवल भारतीय कानून लागू होना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के वाई. नरसिम्हा राव एवं अन्य बनाम वाई. वेंकट लक्ष्मी एवं अन्य और दिल्ली हाईकोर्ट के पद्मिनी हिंदू पुर बनाम अभिजीत एस. बेलूर मामलों के निर्णयों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि सिंगापुर कोर्ट के पास इस मामले में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और इसके लिए श्रीमती जीवंती पांडे बनाम किशन चंद्र पांडे, फिलिप डेविड डेक्सटर बनाम स्टेट (एनसीटी दिल्ली) एवं अन्य और पॉल मोहिंदर गाहून बनाम सेलिना गाहून का हवाला दिया।

वकील ने यह भी तर्क दिया कि चूंकि बच्ची बहुत छोटी है और ऑटिज्म से पीड़ित है, इसलिए उसे मां की कस्टडी की जरूरत है। उन्होंने हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6(ए) तथा सुप्रीम कोर्ट के यशिता साहू बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य मामले का हवाला दिया। इसके अलावा, उन्होंने शिल्पा अग्रवाल बनाम अविरल मित्तल एवं अन्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी का निर्धारण उसी देश द्वारा किया जाना चाहिए जहां बच्चा सबसे अधिक रहा हो।

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दूसरी ओर, पिता के वकील ने दलील दी कि पिता के पास बच्ची का होना किसी भी तरह से “अवैध हिरासत” नहीं माना जा सकता, जिसके लिए हैबियस कॉर्पस रिट जारी की जाए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तेजस्विनी गौड़ एवं अन्य बनाम शेखर जगदीश प्रसाद तिवारी एवं अन्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि बाल कस्टडी विवादों के लिए गहन जांच की आवश्यकता होती है जो केवल सिविल फैमिली कोर्ट ही कर सकती है। उन्होंने के.डी. शर्मा बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड एवं अन्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी कोर्ट के आदेशों को जानबूझकर छिपाने के कारण इस याचिका को खारिज किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

दिल्ली हाईकोर्ट ने सिंगापुर कोर्ट की कार्यवाही और आदेशों को छुपाने के लिए मां की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह से तथ्यों को छिपाना रिट याचिका को खारिज करने के लिए अपने आप में पर्याप्त आधार है। तथ्यों को छिपाने पर पीठ ने टिप्पणी की:

“तथ्यों को छिपाना ही इस रिट याचिका को खारिज करने और भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस कोर्ट के विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने से इनकार करने के लिए एक पर्याप्त आधार है।”

कस्टडी मामलों में हैबियस कॉर्पस याचिका की विचारणीयता पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तेजस्विनी गौड़ मामले का उल्लेख किया और कहा कि ऐसी याचिकाएं केवल असाधारण परिस्थितियों में ही स्वीकार की जा सकती हैं जहां कस्टडी पूरी तरह से अवैध साबित हो:

“बच्चे की कस्टडी के मामलों में, हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की रिट याचिका तभी विचारणीय होती है जब यह साबित हो जाए कि किसी माता-पिता या अन्य व्यक्ति द्वारा नाबालिग बच्चे को अपने पास रखना अवैध था और उसके पास ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।”

कोर्ट ने माना कि रिट कोर्ट केवल हलफनामों के आधार पर संक्षेप में निर्णय लेता है, जबकि बच्चे के सर्वोत्तम हित को निर्धारित करने के लिए विस्तृत गवाही और जांच की आवश्यकता होती है। तेजस्विनी गौड़ मामले को उद्धृत करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“रिट कोर्ट में अधिकारों का निर्धारण केवल हलफनामों के आधार पर किया जाता है। जहां कोर्ट का यह मानना हो कि इस मामले में विस्तृत जांच की आवश्यकता है, वहां कोर्ट असाधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने से इनकार कर सकता है और पक्षों को सिविल कोर्ट जाने का निर्देश दे सकता है। केवल असाधारण मामलों में ही, हैबियस कॉर्पस की याचिका पर असाधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए नाबालिग की कस्टडी को लेकर पक्षों के अधिकारों का निर्धारण किया जाएगा।”

खंडपीठ ने रेखांकित किया कि मामले में कई विवादित बिंदु शामिल हैं, जैसे कि मां द्वारा बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर करने के आरोप, उनकी यात्राएं और क्या दिल्ली कोर्ट के पास इस मामले की सुनवाई का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र है, क्योंकि बच्ची लगातार सिंगापुर में ही रह रही है। इन सभी मुद्दों पर विस्तृत विचार की आवश्यकता है।

हाईकोर्ट का निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 226 के तहत विवेकाधीन असाधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने से इनकार कर दिया और रिट याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने मां को यह स्वतंत्रता दी कि वे सक्षम फैमिली कोर्ट के समक्ष कस्टडी और विजिटेशन राइट्स के लिए अपनी गुहार लगा सकती हैं। कोर्ट ने साफ किया कि इस निर्णय में व्यक्त की गई टिप्पणियां केवल कस्टडी याचिका की विचारणीयता तय करने के लिए हैं और इनका फैमिली कोर्ट की सुनवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सौम्या गोयल बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) एवं अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यू.पी. (क्रिमिनल) 4294/2025
पीठ: जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा
निर्णय की तिथि: 10 जून, 2026

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