देश में 5G सेवाओं के विस्तार के बीच ग्राहकों से पैसे वसूलने और खराब सर्विस देने पर उपभोक्ता अदालतों ने सख्त रुख अपनाना शुरू कर दिया है। शिमला के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक ऐतिहासिक फैसले में भारती एयरटेल (Bharti Airtel) को एक पीड़ित ग्राहक के रीचार्ज के पैसे लौटाने और साथ ही 5,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह पूरा मामला तब सामने आया जब उपभोक्ता ने एयरटेल की हाई-स्पीड 5G सेवाओं के लिए भुगतान किया, लेकिन उन्हें अपने फोन पर केवल बेहद सुस्त ‘E’ (Edge) नेटवर्क सिग्नल ही मिलता रहा।
आयोग के अध्यक्ष बलदेव सिंह और सदस्य निधि शर्मा की पीठ ने बीती 10 जून को दिए अपने आदेश में दूरसंचार प्रदाता कंपनी के इस रवैये को “सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार” (Deficiency in service and unfair trade practice) करार दिया।
पोस्टपेड से प्रीपेड में जाने के बाद भी नहीं सुधरा नेटवर्क
यह कानूनी विवाद अरुण जरयाल नामक उपभोक्ता की शिकायत से शुरू हुआ। अरुण एयरटेल के पोस्टपेड यूजर थे और 22 जून 2024 से ही उनके मोबाइल में इंटरनेट कनेक्टिविटी की लगातार समस्याएं आ रही थीं। उन्होंने भारती एयरटेल लिमिटेड के कस्टमर केयर पर कई बार इसकी शिकायत दर्ज कराई। कंपनी ने समस्या सुलझाने के कुछ प्रयास जरूर किए, लेकिन नेटवर्क की स्थिति जस की तस बनी रही।
नेटवर्क की समस्या से परेशान होकर अरुण ने जुलाई 2024 में अपने नंबर को पोस्टपेड से प्रीपेड में माइग्रेट (बदलने) करने का फैसला लिया। इसके बाद, उन्होंने 7 जुलाई 2024 को एयरटेल की तेज-तर्रार 5G सेवाओं का आनंद लेने के लिए 592.32 रुपये का विशेष प्रीपेड रीचार्ज कराया।
रीचार्ज कराने के बाद भी इंटरनेट की रफ्तार में कोई सुधार नहीं हुआ। एक 5G कंपैटिबल फोन और 5G सिम होने के बावजूद उनके मोबाइल स्क्रीन पर कभी 5G का लोगो नहीं चमका, बल्कि वहां हमेशा पुराना और धीमा ‘E’ (एज) सिग्नल ही दिखाता रहा।
अरुण ने फिर से कस्टमर केयर से संपर्क किया, जहां उन्हें जल्द से जल्द समस्या ठीक करने का भरोसा दिया गया। लेकिन बार-बार ईमेल, फोन कॉल्स और स्थानीय कार्यालय के चक्कर काटने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। आखिरकार एयरटेल ने बिना समाधान किए शिकायत बंद कर दी और उन्हें इसके खिलाफ अपील दायर करने की सलाह दे डाली।
एयरटेल का बचाव: ग्राहक के पास था पुराना 4G फोन
मामला जब उपभोक्ता अदालत पहुंचा, तो एयरटेल ने उपभोक्ता के आरोपों को पूरी तरह गलत और बेबुनियाद बताया। कंपनी की ओर से पेश वकील कुमार कौस्तुभ ने दलील दी कि अरुण जरयाल ‘Xiaomi Redmi Note 9 Pro Max’ हैंडसेट का इस्तेमाल कर रहे थे, जो कि केवल एक 4G फोन है। कंपनी के मुताबिक, इस डिवाइस में 5G नेटवर्क से कनेक्ट होने के लिए जरूरी हार्डवेयर (एंटीना व चिपसेट) मौजूद ही नहीं है।
दूरसंचार कंपनी का कहना था कि मोबाइल फोन की अंदरूनी खराबी, हार्डवेयर डिफेक्ट या सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी के कारण नेटवर्क और इंटरनेट प्रभावित हो सकता है, जो कि पूरी तरह से नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर के नियंत्रण के बाहर की बात है।
उपभोक्ता कोर्ट का फैसला: फोन की जांच की नहीं, तो बहाना क्यों?
दोनों पक्षों को सुनने के बाद शिमला उपभोक्ता आयोग ने तकनीकी दांव-पेचों से इतर कंपनी के सेवा रवैये पर उंगली उठाई।
पीठ ने गौर किया कि एयरटेल ने कोर्ट में दावा तो किया कि ग्राहक का फोन 5G के अनुकूल नहीं था, लेकिन कंपनी ने कभी भी खुद व्यक्तिगत रूप से ग्राहक के हैंडसेट की जांच नहीं की थी। दूसरी तरफ, शिकायतकर्ता अरुण ने कोर्ट के समक्ष दृढ़ता से दोहराया कि उनका फोन पूरी तरह से 5G सेवाओं के अनुकूल था।
आयोग ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि एयरटेल को पहले से पता था कि अरुण का मोबाइल फोन 5G सेवाओं के लिए उपयुक्त नहीं था, तो उन्हें ग्राहक से 5G सेवा के लिए रीचार्ज स्वीकार ही नहीं करना चाहिए था।
10 जून को दिए अपने फैसले में आयोग ने कहा, “जब कंपनी को यह मालूम था कि शिकायतकर्ता का हैंडसेट 5G इंटरनेट सेवाओं के अनुकूल नहीं है, तो कंपनी को शिकायतकर्ता को 592.32 रुपये का 5G रीचार्ज करने की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए थी। जैसे ही कंपनी को इस बात की जानकारी हुई, उन्हें तुरंत वह राशि शिकायतकर्ता को वापस कर देनी चाहिए थी।”
कोर्ट ने माना कि पैसे लेने के बावजूद 5G सेवा न देना और शिकायत का समाधान किए बिना उसे बंद करना पूरी तरह गलत था। इसके तहत अदालत ने भारती एयरटेल को आदेश दिया है कि वह अरुण जरयाल को उनके रीचार्ज के 592.32 रुपये रिफंड करे और मानसिक प्रताड़ना व अदालती खर्च की भरपाई के तौर पर 5,000 रुपये का मुआवजा अदा करे।

