ऑनलाइन बैंकिंग में सिर्फ एक गलत अंक की बड़ी सजा: क्या अब कर्नाटक हाई कोर्ट दिलाएगा महिला को उसके ₹3.25 लाख वापस?

डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में तकनीक जितनी आसान है, जरा सी चूक उतनी ही भारी पड़ सकती है। बेंगलुरु में एक गृहणी द्वारा बैंक ट्रांसफर के दौरान की गई महज एक अंक की गलती अब देश के बैंकिंग नियमों और उपभोक्ता अधिकारों पर बहस का नया मुद्दा बन गई है। इस गंभीर प्रशासनिक गतिरोध को सुलझाने के लिए अब कर्नाटक हाई कोर्ट ने दखल दिया है, जिससे पीड़िता को अपनी गाढ़ी कमाई वापस मिलने की नई उम्मीद जगी है।

मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सूरज गोविंदराज ने फेडरल बैंक को एक सख्त और व्यावहारिक निर्देश दिया। कोर्ट ने बैंक से कहा कि वह उस निष्क्रिय (dormant) खाते के धारक—’मैसर्स स्टैंडर्ड इंजीनियरिंग वर्क्स’—का पता और संपर्क विवरण तुरंत याचिकाकर्ता नुजैबा जलील को सौंपे। इस आदेश के बाद अब जलील की कानूनी टीम उस अज्ञात और लापता लाभार्थी को सीधे कानूनी नोटिस भेज सकेगी, जो महीनों से चल रही इस उलझन की सबसे बड़ी वजह है।

“1619” की जगह “1916”: सिर्फ चार अंकों का फेर और फंसा पैसा

इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत पिछले साल 17 दिसंबर 2025 को हुई थी। नुजैबा जलील ने आरटीजीएस (RTGS) के जरिए अपने पिता को ₹3.25 लाख भेजने का प्रयास किया। लेकिन स्क्रीन पर कीबोर्ड की एक मामूली सी चूक के कारण उन्होंने खाते के आखिरी चार अंकों “1619” को उलटकर “1916” दर्ज कर दिया।

गलत नंबर डालते ही वह पूरी रकम फेडरल बैंक में ‘मैसर्स स्टैंडर्ड इंजीनियरिंग वर्क्स’ नाम की एक फर्म के निष्क्रिय खाते में ट्रांसफर हो गई।

अगले ही दिन (18 दिसंबर) जलील ने बैंक को इस गलती की सूचना दी। लेकिन इसके बाद शुरू हुआ नियमों का एक लंबा और थका देने वाला सिलसिला। 19 दिसंबर को फेडरल बैंक ने यह कहते हुए उनकी अर्जी खारिज कर दी कि संबंधित खाताधारक का कोई अता-पता नहीं है, इसलिए वे इस ट्रांजैक्शन को रिवर्स नहीं कर सकते।

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नियमों की भूलभुलैया: जब बैंक और लोकपाल ने खड़े किए हाथ

फेडरल बैंक ने जलील के पैसे को सुरक्षित रखने के लिए उस निष्क्रिय खाते पर ‘लीन’ (Lien) लगा दिया—यानी पैसे को फ्रीज कर दिया ताकि कोई उसे निकाल न सके। लेकिन बैंक का यह भी कहना था कि बिना खाताधारक की लिखित सहमति या कोर्ट के आदेश के, वे यह पैसा जलील को वापस भेजने के लिए कानूनी रूप से अधिकृत नहीं हैं।

प्रशासनिक स्तर पर हार मानकर जलील ने 31 जनवरी 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के बैंकिंग लोकपाल (Ombudsman) से गुहार लगाई। लेकिन वहां से भी उन्हें निराशा हाथ लगी। 19 फरवरी को लोकपाल ने उनकी शिकायत को खारिज कर दिया। लोकपाल का तर्क था कि चूंकि नियम के तहत लाभार्थी की सहमति अनिवार्य है, इसलिए बैंक द्वारा एकतरफा पैसा वापस न करना ‘सेवा में कमी’ (Service Failure) नहीं माना जा सकता।

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यह स्थिति जलील के लिए एक अजीब पहेली बन गई: उन्हें अपना ही पैसा वापस पाने के लिए एक ऐसी फर्म की मंजूरी चाहिए थी, जिसे बैंक खुद भी ढूंढने में असमर्थ था।

संवैधानिक अधिकारों की जंग: क्या लापता व्यक्ति की सहमति जरूरी है?

इस अन्याय के खिलाफ नुजैबा जलील ने कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके वकील मोहम्मद इर्शाद एम.एच. ने अदालत में एक बेहद तार्किक दलील पेश की। उन्होंने कहा कि बैंकिंग लोकपाल इस बुनियादी तथ्य को समझने में नाकाम रहा कि जो व्यक्ति या संस्था ‘लापता’ है, उससे सहमति प्राप्त करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300ए (Article 300 A) का सहारा लिया गया है, जो किसी भी नागरिक को बिना कानूनी प्रक्रिया के उसकी संपत्ति से वंचित करने से रोकता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि देश का कानून किसी नागरिक की मेहनत की कमाई को किसी दूसरे की देनदारी चुकाने के लिए रोकने की अनुमति नहीं दे सकता।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूरज गोविंदराज ने इस बात पर गौर किया कि उस निष्क्रिय खाते के मालिक को अभी तक इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है। उन्होंने बैंक के कानूनी पक्ष को सही मानते हुए भी याचिकाकर्ता को भरोसा दिया।

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न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा, “प्रक्रिया के तहत बैंक जो कह रहा है, वह गलत नहीं है। आपकी राहत मिलने में थोड़ी देरी जरूर होगी, लेकिन राहत मिलेगी। हम आपको उस निष्क्रिय खाताधारक को व्यक्तिगत रूप से समन (Hand Summons) भेजने की अनुमति देते हैं। अगर वे वहां नहीं मिलते हैं, तो मान लिया जाएगा कि वे अस्तित्व में ही नहीं हैं।”

आगे का रास्ता और सुनवाई की अगली तारीख

फेडरल बैंक से पता मिलने के बाद अब याचिकाकर्ता सीधे समन जारी कर सकेगी। यदि वह फर्म कोर्ट के नोटिस का जवाब देने नहीं आती है, तो हाई कोर्ट के पास इस ट्रांजैक्शन को एकतरफा निरस्त (Unilateral Reversal) करने और पैसा लौटाने का ठोस कानूनी आधार होगा।

इस मामले की अगली सुनवाई अब 15 जून 2026 को तय की गई है। इस केस के फैसले पर न केवल जलील की उम्मीदें टिकी हैं, बल्कि यह भविष्य में ऑनलाइन बैंकिंग के दौरान होने वाली ऐसी गलतियों के लिए एक बड़ा कानूनी उदाहरण भी स्थापित कर सकता है।

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