सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के घर से बिना लाइसेंस का हथियार बरामद होना ही आर्म्स एक्ट, 1959 के तहत सजा का आधार नहीं बन सकता, जब तक कि अभियोजन पक्ष यह साबित न कर दे कि आरोपी का उस हथियार पर ‘सचेत कब्जा’ (कॉन्शियस पजेशन) और नियंत्रण था। झारखंड राज्य द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने एक मकान मालिक को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा, जिसे जान के खतरे और दबाव में उग्रवादियों को अपने घर में अस्थायी शरण देनी पड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि गंभीर भय या जान के खतरे के तहत किसी वस्तु को अपने पास रखने को सचेत कब्जा नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 12 अगस्त 2001 की एक घटना से जुड़ा है। सेन्हा पुलिस स्टेशन के प्रभारी चेतननद सिन्हा ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के साथ मिलकर तोरार गांव में उग्रवादियों को पकड़ने के लिए एक संयुक्त छापेमारी की थी। पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि उग्रवादी तोरार गांव से भागकर डोरा गांव में प्रतिवादी जगदीश लकड़ा के घर में शरण ले चुके हैं। इस सूचना पर पुलिस बल ने जगदीश लकड़ा के घर की घेराबंदी की।
जैसे ही पुलिस आगे बढ़ी, चार उग्रवादियों ने पीछे के दरवाजे से भागने की कोशिश की। इनमें से एक उग्रवादी बीरेन्द्र उरांव को मौके पर ही पकड़ लिया गया, जबकि तीन अन्य—जिनकी पहचान एरिया कमांडर नकुलजी, शिव कुमार साहू और उमेश कुमार के रूप में हुई—भागने में सफल रहे। पकड़े गए बीरेन्द्र उरांव और मकान मालिक जगदीश लकड़ा दोनों ने पुलिस को बताया कि भागने वाले उग्रवादी सुबह 4:00 बजे घर आए थे और पुलिस के वाहनों की आवाज सुनते ही अपने सामान (पैसे के बैग, वर्दी, दवाएं और एक देसी स्टेन गन) छोड़कर भाग गए। स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में जगदीश लकड़ा के घर की तलाशी लेने पर ये सभी आपत्तिजनक सामान बरामद किए गए।
जांच के बाद, जगदीश लकड़ा और अन्य के खिलाफ आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-बी)ए, 26, और 35, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 116 और क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट की धारा 17(i) के तहत आरोप तय किए गए। ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत दोनों ने जगदीश लकड़ा को दोषी माना और आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-बी)ए के तहत तीन साल के सश्रम कारावास और धारा 26 के तहत एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। लकड़ा ने इस सजा को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। 9 मई 2023 को हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को त्रुटिपूर्ण मानते हुए सजा को रद्द कर दिया और आरोपी को बरी कर दिया। इस फैसले के खिलाफ झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
झारखंड राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील शांतनु सागर ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने छापेमारी, गिरफ्तारी और जब्ती से जुड़े सुसंगत और विश्वसनीय सबूतों की अनदेखी की है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकारी गवाहों और जांच अधिकारी के बयानों में पूर्ण समानता थी। उन्होंने यह भी कहा कि देसी स्टेन गन और कारतूसों की बरामदगी को सीजर मेमो में दर्ज किया गया था और अदालत के सामने इन्हें भौतिक साक्ष्य के रूप में पेश किया गया था। कुछ स्वतंत्र गवाहों के मुकर जाने (होस्टाइल होने) के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि केवल इस आधार पर बरामदगी को खारिज नहीं किया जा सकता, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जहां उग्रवादी गतिविधियां सक्रिय होती हैं और स्थानीय लोग डर और धमकी के कारण गवाही देने से कतराते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने बिना किसी ठोस कारण के दो निचली अदालतों के फैसले को पलट दिया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी जगदीश लकड़ा के वकील परमानंद गौड़ ने दलील दी कि प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के सदस्यों ने उनके मुवक्किल के घर में जबरन शरण ली थी और इसमें मकान मालिक की कोई स्वैच्छिक भूमिका नहीं थी। बरामद स्टेन गन पूरी तरह से भागने वाले उग्रवादियों की थी और उस पर जगदीश लकड़ा का कभी कोई सचेत कब्जा या नियंत्रण नहीं था। झारखंड की सामाजिक वास्तविकताओं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ग्रामीण अक्सर उग्रवादियों के दबाव और जबरदस्ती का शिकार होते हैं जो भोजन और आश्रय के लिए उनके घरों पर कब्जा कर लेते हैं। ऐसे में विरोध करने पर ग्रामीणों की जान को गंभीर खतरा पैदा हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने घटना के समय चक्र पर ध्यान दिया और पाया कि उग्रवादी सुबह 4:00 बजे जगदीश लकड़ा के घर पहुंचे थे और पुलिस ने सुबह 6:00 बजे छापेमारी की थी, जिसका मतलब है कि वे केवल दो घंटे ही वहां मौजूद थे।
पीठ ने लकड़ा के इस स्पष्टीकरण में सच्चाई पाई कि आपत्तिजनक सामान उनके घर में अत्यधिक दबाव और जान के खतरे के कारण छूटा था। कोर्ट ने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि राज्य सरकार का खुद का यह तर्क—कि स्थानीय गवाह भय और आतंक के माहौल के कारण मुकर जाते हैं—वास्तव में प्रतिवादी के इसी डर और मजबूरी के दावे का समर्थन करता है।
अदालत ने माना कि यदि गंभीर भय या जान के खतरे के कारण कोई आपत्तिजनक सामग्री घर में रखी जाती है, तो ऐसे कब्जे को कानूनन “सचेत कब्जा” नहीं कहा जा सकता। जान के खतरे के तहत या जबरन थोपे गए कब्जे को किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
कब्जे की कानूनी सीमाओं को स्पष्ट करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने फ्रांसिस जेवियर सालेमाओ बनाम राज्य (पब्लिक प्रोसिक्यूटर के माध्यम से) (2007 एससीसी ऑनलाइन बॉम्बे 1261) के मामले में स्थापित मिसाल का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:
“हथियार के कब्जे में उस कब्जे की चेतना या ज्ञान का तत्व होना चाहिए। भले ही व्यक्ति वास्तविक रूप से शारीरिक कब्जे में न हो, फिर भी उस हथियार पर उसका ऐसा नियंत्रण या शक्ति होनी चाहिए जिससे उसका कब्जा बना रहे, भले ही वह भौतिक रूप से किसी और के पास हो। कब्जे के किसी भी विवादित सवाल में, केवल स्वीकार किए गए या साबित किए गए विशिष्ट तथ्य ही नियंत्रण या वर्चस्व के उस वास्तविक संबंध को स्थापित करेंगे जो यह तय करने के लिए आवश्यक है कि क्या वह व्यक्ति उस वस्तु के कब्जे में था या नहीं।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि झारखंड हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का सही ढंग से मूल्यांकन किया था और सजा को पलटने में एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया था। अदालत को हाईकोर्ट के फैसले में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं मिली और इसके साथ ही पीठ ने झारखंड राज्य की अपील को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: झारखंड राज्य बनाम जगदीश लकड़ा
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या… वर्ष 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) संख्या 4978 वर्ष 2024 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
निर्णय की तिथि: 13 जुलाई 2026

