वयस्क महिला को अपनी मर्जी से रहने, शादी करने और पढ़ने का पूरा अधिकार: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी भी वयस्क महिला को अपनी पसंद से रहने, शादी करने और उच्च शिक्षा हासिल करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न तो उसका परिवार और न ही राज्य सरकार उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए मजबूर कर सकती है।

यह निर्णय कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र वी. घुगे और जस्टिस गौतम ए. अनखाड की बेंच ने 2 जुलाई को एक मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया। कोर्ट ने तेलंगाना से भागकर महाराष्ट्र आई एक 21 वर्षीय युवती को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है। यह युवती अपने कजिन (रिश्तेदार के भाई) से जबरन शादी कराए जाने के दबाव के कारण अपना घर छोड़कर आई थी। हाईकोर्ट ने तेलंगाना पुलिस को युवती के माता-पिता द्वारा दर्ज कराई गई गुमशुदगी की रिपोर्ट बंद करने का आदेश दिया और निर्देश दिया कि उसे घर लौटने के लिए किसी भी तरह से मजबूर न किया जाए।

जस्टिस अनखाड ने बेंच की ओर से फैसला लिखते हुए कहा कि जीवन के ये फैसले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 21 साल की होने के नाते यह महिला कानूनन अपने निवास, विवाह और पढ़ाई से जुड़े फैसले लेने के लिए पूरी तरह सक्षम है।

युवती का न्यायिक मूल्यांकन

सुनवाई के दौरान जजों ने चैंबर में युवती से सीधे बातचीत की। कोर्ट ने पाया कि वह काफी परिपक्व है, अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने में सक्षम है और अपने फैसलों के नतीजों से पूरी तरह वाकिफ है। जजों ने यह भी नोट किया कि युवती पर किसी भी तरह का बाहरी दबाव, प्रभाव या प्रलोभन नहीं था।

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आत्मनिर्भर (स्वनियोजित) हो चुकी इस याचिकाकर्ता ने अपने परिवार से मिल रही धमकियों और उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट में उनका पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील मिहिर देसाई ने बताया कि युवती एक बेहद रूढ़िवादी पृष्ठभूमि से आती है, जहां उसे अपनी बात रखने की आजादी नहीं थी और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। देसाई के अनुसार, युवती ने 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद घर छोड़ दिया था क्योंकि उसके माता-पिता उसकी आगे की पढ़ाई और आत्मनिर्भर बनने के सपने के खिलाफ थे। वे उस पर खुद से 10 साल बड़े कजिन से शादी करने का दबाव बना रहे थे।

सुरक्षा को लेकर चिंताएं और माता-पिता का आश्वासन

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याचिकाकर्ता बचपन से ही अपने दत्तक (गोद लेने वाले) माता-पिता के साथ रह रही थी और उनके खिलाफ उसे कोई शिकायत नहीं थी। हालांकि, उसने कोर्ट के सामने आशंका जताई कि उसका जैविक (सगा) परिवार और समुदाय के लोग उसे जबरन तेलंगाना वापस ले जा सकते हैं या उसकी सुरक्षा को खतरा पहुंचा सकते हैं।

जजों ने इस मामले में युवती के दत्तक माता-पिता से भी अलग से बात की। उन्होंने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वे युवती की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं डालेंगे और न ही उस पर शादी के लिए दबाव बनाएंगे। हालांकि, बेंच ने साफ किया कि माता-पिता के ये आश्वासन युवती की अपनी व्यक्तिगत पसंद और फैसलों से ऊपर नहीं हो सकते।

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युवती ने अपने माता-पिता के घर लौटने से साफ इनकार कर दिया, लेकिन उसने कोर्ट को वचन दिया कि वह अपने माता-पिता के साथ नियमित संपर्क में रहेगी ताकि वे उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतित न हों और उसे ढूंढने की कोशिश न करें। कोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि युवती को लापता व्यक्ति मानने या उसे जबरन वापस भेजने के लिए किसी भी कानूनी कार्रवाई को जारी रखने का कोई आधार नहीं है।

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