पहचान का विवाद: कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु से कथित बांग्लादेशी नागरिक के निर्वासन पर लगाई अंतरिम रोक

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कथित तौर पर अवैध बांग्लादेशी नागरिक बताकर हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति को देश से बाहर भेजने (निर्वासन) के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता का दावा है कि वह जन्म से भारतीय नागरिक है और गलत पहचान के कारण उसे निशाना बनाया गया है।

जस्टिस सूरज गोविंदराज ने अब्दुल रहीम नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (एफआरआरओ) को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता की पहचान का सत्यापन करे। इसके साथ ही कोर्ट ने अधिकारियों को आगामी 14 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता को देश से बाहर न भेजने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने एफआरआरओ से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि क्या यह मामला उत्तर प्रदेश की एक कोर्ट में चली उस कार्यवाही से जुड़ा है, जिसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील लंबित है।

हिरासत और पहचान का विवाद

अब्दुल रहीम को इसी साल 5 मार्च को बेंगलुरु की परप्पना अग्रहारा पुलिस ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के लिए चलाए गए एक अभियान के दौरान हिरासत में लिया था। हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने उन्हें एफआरआरओ के सुपुर्द कर दिया था। एफआरआरओ ने उसी दिन फॉरेनर्स एक्ट के तहत रहीम की गतिविधियों को प्रतिबंधित करने और उन्हें बेंगलुरु के कोथानूर स्थित यूटाइल फाउंडेशन डिटेंशन सेंटर में रखने का आदेश जारी किया था।

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एफआरआरओ के इस आदेश में रहीम को एक विदेशी नागरिक मानते हुए उनकी पहचान “मोहम्मद रहीम हावलादार, पिता मोहम्मद मोतालेब हावलादार” के रूप में की गई थी।

अदालत में रहीम का पक्ष रख रहे अधिवक्ता क्लिफ्टन डी. रोजारियो ने दलील दी कि उनके मुवक्किल जन्म से ही भारत के नागरिक हैं। अपनी दलील के समर्थन में उन्होंने कोर्ट के समक्ष रहीम का जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और उनके परिवार के अन्य सदस्यों से जुड़े दस्तावेज पेश किए, जो भारत में उनकी गहरी जड़ों को साबित करते हैं।

याचिका के अनुसार, रहीम का जन्म 14 अप्रैल 1979 को दिल्ली के न्यू सीमापुरी इलाके में हुआ था और वे जीवन भर भारत में ही रहे और काम करते रहे। याचिका में आरोप लगाया गया है कि एफआरआरओ ने नागरिकता की कोई जांच किए बिना और रहीम को अपनी बात रखने का मौका दिए बिना ही यह कार्रवाई की, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 22 का सीधा उल्लंघन है।

उत्तर प्रदेश का पुराना मामला और दोहरे दंड की दलील

इस मामले के तार उत्तर प्रदेश में साल 2010 में दर्ज हुए एक पुराने मामले से भी जुड़े हैं। जून 2012 में गाजियाबाद की एक सत्र अदालत ने रहीम को वैध दस्तावेजों के बिना भारत में प्रवेश करने का दोषी पाया था। उस समय उन्हें बांग्लादेश के बागेरहाट का निवासी “अब्दुल रहीम, पिता शाह जमाल” बताते हुए फॉरेनर्स एक्ट के तहत सजा सुनाई गई थी।

याचिका के अनुसार, उस मामले में सजा का मुख्य आधार यह था कि आरोपी अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाया था और उसके दस्तावेज़ों को पर्याप्त नहीं माना गया था। रहीम ने इस फैसले को साल 2012 में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां से उन्हें जमानत मिल गई थी। यह अपील अभी भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है।

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बेंगलुरु एफआरआरओ की कार्रवाई का विरोध करते हुए अधिवक्ता रोजारियो ने तर्क दिया कि यह मामला दोहरे दंड (डबल जियोपार्डी) का है। यह संविधान के अनुच्छेद 20 (विशेषकर अनुच्छेद 20(3)) के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जो किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित करने से रोकता है।

बेंगलुरु में कारोबार और पारिवारिक जीवन

याचिका में बताया गया है कि रहीम साल 2014 में दिल्ली से बेंगलुरु चले गए थे। यहां वे कचरा प्रबंधन और कबाड़ के कारोबार से जुड़े हैं, जो सरकारी अधिकारियों के पास एक एकल स्वामित्व (प्रोपराइटरशिप) फर्म के रूप में पंजीकृत है। उनके पास कर्नाटक वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अधिनियम, 2017 के तहत वैध पंजीकरण भी है।

बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि इस अप्रत्याशित हिरासत के कारण रहीम का पूरा व्यवसाय ठप हो गया है और बेंगलुरु में रह रहे उनके परिवार, जिसमें उनकी पत्नी और एक नवजात शिशु शामिल है, के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। याचिका में एफआरआरओ के आदेश को रद्द करने और रहीम को तुरंत रिहा करने की मांग की गई है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 14 जुलाई को होगी।

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