संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का सम्मान करना हम सभी का दायित्व: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और मान-सम्मान को बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह हम सभी का साझा दायित्व है और हर किसी को इसे पूरी जिम्मेदारी से निभाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के एक कोर्टरूम में एक याचिकाकर्ता द्वारा किए गए अमर्यादित व्यवहार के संबंध में पूछे गए सवाल पर की।

कोर्टरूम में हुए हंगामे पर टिप्पणी से इनकार

दरअसल, पिछले शुक्रवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान खुद पैरवी कर रहे एक वादी (लिटिगेंट) ने अदालत में हंगामा किया था। जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने हुई इस सुनवाई में उस व्यक्ति ने कथित तौर पर अपशब्द कहे और अपने कानूनी दस्तावेज फेंक दिए, जिसके बाद उसे जबरन कोर्टरूम से बाहर निकाला गया। इस घटना पर सीधे तौर पर कोई भी टिप्पणी करने से बचते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कई बार बच्चे ऐसी हरकतें कर देते हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा और मान-सम्मान को बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।

अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचाने का संकल्प

मुख्य न्यायाधीश ‘ऑल इंडिया सीनियर एडवोकेट एसोसिएशन’ (AISAA) द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में बोल रहे थे। यह समारोह हाल ही में सेवानिवृत्त हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पंकज मिथल और नव-नियुक्त पांच जजों—जस्टिस शील नागू, जस्टिस श्री चंद्रशेखर, जस्टिस संजीव सचदेवा, जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस वेंकिटा सुब्रमण्यम मोहना—के सम्मान में आयोजित किया गया था।

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इस अवसर पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कॉलेजियम के सदस्यों द्वारा इन पांचों जजों का चयन वरिष्ठतम न्यायाधीशों के सामूहिक विवेक और सूझबूझ को दर्शाता है। उन्होंने समारोह में उपस्थित लोगों को भरोसा दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक त्वरित, सस्ता और समय पर न्याय पहुंचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आम नागरिक को देश की शीर्ष अदालत तक पहुंचने से रोकने वाली किसी भी बाधा को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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