सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश दिया है ताकि मुकदमों (ट्रायल) में होने वाली प्रशासनिक देरी की वजह से आरोपियों को अनिश्चितकाल के लिए जेल में बंद न रहना पड़े। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूशन) की नाकामियों और लचर व्यवस्था के कारण किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता।
जस्टिस ए. अमानुल्लाह और जस्टिस शील नागू की पीठ ने यह निर्देश शुक्रवार को एक हत्या के मामले की सुनवाई के दौरान दिया। हालांकि, अदालत ने हत्या के चार साल पुराने मामले में जेल में बंद विदेशी नागरिक केल्विन चिन्दोज़ी ओकोरो की जमानत याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन चार साल की लंबी अवधि के बावजूद ट्रायल की बेहद सुस्त रफ्तार पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि इतने वर्षों में अभियोजन पक्ष 45 में से केवल दो गवाहों की ही जांच कर पाया है।
न्यायालय ने कहा कि सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोपी को डिफ़ॉल्ट जमानत से रोकने के लिए 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर दिया जाता है। लेकिन इसके बाद अगले चार वर्षों तक मुकदमे को आगे बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम न उठाना गंभीर लापरवाही है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि इस लंबी देरी के लिए आखिरकार किसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
राज्य सरकार ने स्वीकारी अभियोजन की लापरवाही
सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार के कानूनी प्रतिनिधि ने अपनी कमियों को स्वीकार किया। उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार प्रशासनिक स्तर पर होने वाले इस विलंब को सुधारने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने दलील दी कि इस तरह की देरी आमतौर पर पुराने मामलों में देखने को मिलती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस अमानुल्लाह ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार का यह रवैया दोहरा मापदंड दिखाता है, जिसमें वह एक तरफ तो अदालतों में जमानत याचिकाओं का पुरजोर विरोध करती है, लेकिन दूसरी तरफ धरातल पर मुकदमों को समय से पूरा करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाती। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र से जुड़े ऐसे कई मामले रोजाना सामने आते हैं, जहां मुकदमे तीन से पांच साल तक बिना किसी प्रगति के लटके रहते हैं, जिससे लोगों की आजादी प्रभावित होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में इस पूरी स्थिति को अत्यंत चिंताजनक बताया और कहा कि समय पर निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के अपने बुनियादी कर्तव्य में राज्य सरकार पूरी तरह नाकाम दिख रही है। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को एक जवाबी हलफनामा (काउंटर एफिडेविट) दाखिल कर इस प्रशासनिक विफलता पर स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है।
पंजाब और महाराष्ट्र के मामलों की संयुक्त सुनवाई 24 जुलाई को
यह मामला ठीक वैसी ही स्थिति को दर्शाता है जैसी सुप्रीम कोर्ट ने एक दिन पहले यानी गुरुवार को पंजाब के एक मामले में देखी थी। पंजाब में भी ट्रायल में इसी तरह की देरी से नाराज होकर पीठ ने अमृतसर के सीनियर सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (एसएसपी) पर 50,000 रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया था, जिसे राज्य सरकार का आधिकारिक जवाब आने तक फिलहाल रोक कर रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अब महाराष्ट्र और पंजाब दोनों राज्यों के इन गंभीर मामलों को एक साथ जोड़ दिया है। दोनों सरकारों के आधिकारिक स्पष्टीकरण और जवाबों की समीक्षा के लिए इस मामले की अगली संयुक्त सुनवाई 24 जुलाई को तय की गई है।

