छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पुलिस अधिकारियों की गवाही को भी किसी अन्य गवाह की तरह ही परखा जाना चाहिए और केवल उनके आधिकारिक पद के आधार पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेष रूप से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में, जहां स्वतंत्र सार्वजनिक गवाहों को जुटाना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन होता है, यह नियम अधिक प्रासंगिक हो जाता है। कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने एक व्यक्ति की आपराधिक अपील को खारिज करते हुए विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 के तहत उसे दी गई 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा। यह निर्णय हाईकोर्ट द्वारा मूल रिकॉर्ड और मामले से जुड़े दस्तावेजों (फाइल संख्या 2026_jul_21282_1_2026_07_09.pdf) के गहन अवलोकन के बाद लिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 14 अप्रैल, 2023 को भैरमगढ़ पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सदस्य पुलिस टीम को नुकसान पहुँचाने के लिए ग्राम फुल्लोड में विस्फोटक सामग्री के साथ एकत्र हो रहे हैं। पुलिस को यह भी जानकारी मिली थी कि बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से माओवादियों के नए कैंप हिरोली पुसनार में भी विस्फोटक पहुँचाए गए हैं। बीजापुर के पुलिस अधीक्षक के मौखिक निर्देशों पर, तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी पुलिस (एसडीओपी) भैरमगढ़ तरेष साहू के नेतृत्व में एक पुलिस दल स्वतंत्र गवाहों को साथ लेकर ग्राम फुल्लोड की ओर रवाना हुआ।
पुलिस टीम को देखते ही वहां मौजूद संदिग्ध भागने लगे। जहां चार व्यक्ति भागने में सफल रहे, वहीं पुलिस टीम ने अपीलकर्ता मीनू कलमु उर्फ कलमुमी मनोज उर्फ डेंगा को मौके पर ही पकड़ लिया। पूछताछ में उसने प्रतिबंधित संगठन की भैरमगढ़ एरिया कमेटी से जुड़े होने की बात स्वीकार की। तलाशी के दौरान अपीलकर्ता की पैंट की जेब से एक इलेक्ट्रिक डेटोनेटर बरामद हुआ, जिसके संबंध में वह कोई वैध लाइसेंस या प्राधिकार पत्र प्रस्तुत नहीं कर सका।
इसके बाद पुलिस हिरासत में अपीलकर्ता ने स्वेच्छा से खुलासा किया कि उसने भागते समय खेत में एक चाकू और विस्फोटक सामग्री से भरा थैला फेंक दिया था। उसके निशानदेही बयान के आधार पर पुलिस ने खेत से एक थैला बरामद किया जिसमें 10 जिलेटिन की छड़ें, छह इलेक्ट्रिक डेटोनेटर, लगभग पांच मीटर लाल कोडेक्स वायर, हरे रंग का सेफ्टी फ्यूज वायर और एक चाकू बरामद हुआ।
जांच पूरी होने और जिला मजिस्ट्रेट से आवश्यक अभियोजन मंजूरी प्राप्त करने के बाद अदालत में चार्जशीट दाखिल की गई। दक्षिण बस्तर, दंतेवाड़ा की विशेष अदालत (एनआईए एक्ट) ने सुनवाई के बाद अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 की धारा 4 और 5 के तहत दोषी माना। अदालत ने उसे धारा 4 के तहत 10 साल और धारा 5 के तहत 5 साल के कठोर कारावास की सजा के साथ-साथ जुर्माने की सजा सुनाई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता बी.पी. राव ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपना मामला साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। उन्होंने गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विसंगतियों और विरोधाभासों की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया कि मामले का एकमात्र स्वतंत्र गवाह कमलेश कोरसा (पीडब्लू-1) मुकर गया (होस्टाइल हो गया) और उसने पुलिस की कहानी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि पूरी सजा केवल पुलिस गवाहों की गवाही पर आधारित है, जो मामले में सीधे तौर पर रुचि रखते हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तर्क दिया कि कथित विस्फोटक खुले मैदान से बरामद किए गए थे और अपीलकर्ता को झूठा फंसाने के लिए पुलिस ने इन्हें खुद वहां रखा था।
राज्य सरकार के वकील शालीन सिंह बघेल ने इन तर्कों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला पूरी तरह स्थापित किया है। उन्होंने जोर दिया कि अपीलकर्ता को बेहद संवेदनशील और घने नक्सल प्रभावित क्षेत्र से पकड़ा गया था। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रिक डेटोनेटर की बरामदगी पूरी तरह से साबित हो चुकी थी, और केवल स्वतंत्र गवाह के मुकर जाने या मामूली तकनीकी विसंगतियों से आधिकारिक गवाहों की विश्वसनीय और सुसंगत गवाही कमजोर नहीं होती।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने मामले के मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की सूक्ष्मता से जांच की। कोर्ट ने पाया कि खोजी अधिकारी एसडीओपी तरेष साहू (पीडब्लू-2) की गवाही अत्यंत स्वाभाविक और तर्कसंगत थी, जो लंबी जिरह के बाद भी पूरी तरह अडिग रही। उनके बयान की पुष्टि अन्य आधिकारिक गवाहों जैसे हेड कांस्टेबल देवेंद्र चंद्रवंशी (पीडब्लू-4), थाना प्रभारी धर्मराम तिर्की (पीडब्लू-7) और हेड कांस्टेबल गोकुल राम साहू (पीडब्लू-8) ने की।
इसके अलावा, बम निरोधक दस्ते के सब-इंस्पेक्टर महेंद्र पाठक (पीडब्लू-6) ने कोर्ट में सिद्ध किया कि जब्त किए गए विस्फोटकों को सुरक्षित रूप से नियंत्रित विस्फोट के जरिए नष्ट किया गया था और वैज्ञानिक परीक्षण के लिए उनके अवशेषों को सुरक्षित रखा गया था, जिससे सुबूतों की कड़ी (चैन ऑफ कस्टडी) पूरी तरह सुरक्षित रही। डिप्टी एसपी जितेंद्र कुमार चंद्रवंशी (पीडब्लू-11) ने यह भी साबित किया कि अभियोजन के लिए आवश्यक सभी कानूनी स्वीकृतियां सही तरीके से प्राप्त की गई थीं।
स्वतंत्र गवाह के मुकर जाने और केवल पुलिसकर्मियों की गवाही पर निर्भरता के बचाव पक्ष के तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस की गवाही को बिना ठोस कारण के अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के ‘नाथू सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ मामले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“केवल इस तथ्य के आधार पर कि वे पुलिस अधिकारी हैं, उनकी गवाही को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं था। अपीलकर्ता के प्रति उनकी किसी भी प्रकार की शत्रुता का कोई कारण नहीं दिखाया गया।”
हाईकोर्ट ने ‘अनिल बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था:
“कानून का ऐसा कोई नियम नहीं है कि पुलिस अधिकारियों के साक्ष्य को खारिज कर दिया जाना चाहिए या उसमें कोई अंतर्निहित कमजोरी होती है। हालांकि, विवेक का यह तकाजा है कि जो पुलिस अधिकारी मामले के परिणाम में रुचि रखते हैं, उनके साक्ष्यों की सावधानीपूर्वक जांच और स्वतंत्र रूप से सराहना की जानी चाहिए। पुलिस अधिकारी गवाही देने के लिए किसी भी तरह से अयोग्य नहीं हैं और केवल उनका पुलिस अधिकारी होना ही उनकी विश्वसनीयता पर किसी संदेह को जन्म नहीं देता है।”
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के ‘स्टेट (दिल्ली सरकार) बनाम सुनील’ मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह माना गया था कि पुलिस अधिकारियों को अविश्वसनीय मानने का कोई कानूनी अनुमान नहीं है और उनकी गवाही को शुरू से ही अविश्वास की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्वतंत्र गवाहों की अनुपलब्धता पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे दुर्गम और अशांत क्षेत्रों में पुलिस ऑपरेशन्स की अपनी अनूठी चुनौतियां होती हैं। सुप्रीम कोर्ट के ‘अजमेर सिंह बनाम हरियाणा राज्य’ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि अभियोजन पक्ष के मामले के समर्थन में स्वतंत्र साक्ष्य होने चाहिए। हालांकि, यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है। इसलिए, इस मामले की विशेष परिस्थितियों में, हम संतुष्ट हैं कि यदि अपीलकर्ता को केवल इसलिए बरी कर दिया जाता है क्योंकि कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया है, तो यह न्याय का मखौल होगा।”
कोर्ट ने अजमेर सिंह मामले के निर्णय से आगे उद्धृत किया:
“हम यह नहीं भूल सकते कि हर जगह और हर समय स्वतंत्र गवाह पाना संभव नहीं हो सकता है। जनता से गवाह लेने की बाध्यता पूर्ण नहीं है। यदि परिस्थितियों में उचित प्रयास करने के बाद भी पुलिस अधिकारी छापेमारी या गिरफ्तारी में आम जनता के गवाहों को शामिल करने में असमर्थ रहता है, तो की गई गिरफ्तारी और बरामदगी आवश्यक रूप से दूषित नहीं मानी जाएगी।”
बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि बचाव पक्ष द्वारा उठाए गए मामूली अंतर—जैसे वाहनों के नंबर, डेटोनेटर का आकार या अपीलकर्ता के कपड़ों का रंग—महत्वहीन विवरण हैं जो समय बीतने के कारण स्वाभाविक रूप से होते हैं और ये अभियोजन पक्ष की मुख्य कहानी को प्रभावित नहीं करते।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि अभियोजन पक्ष ने उन सभी परिस्थितियों की कड़ी को सफलतापूर्वक साबित कर दिया है जिससे यह स्पष्ट होता है कि अपीलकर्ता के पास जानबूझकर रखे गए इलेक्ट्रिक डेटोनेटर और अन्य विस्फोटक बरामद हुए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता का यूएपीए और आईपीसी के आरोपों से बरी होना विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 की धारा 4 और 5 के तहत स्वतंत्र रूप से सिद्ध हुए अपराधों और साक्ष्यों को कमजोर नहीं करता।
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने विशेष अदालत द्वारा 22 सितंबर, 2025 को दी गई सजा और फैसले की पुष्टि की और अपीलकर्ता की आपराधिक अपील को आधारहीन पाते हुए खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मीनू कलमु उर्फ कलमुमी मनोज उर्फ डेंगा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2480/2025
पीठ: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
निर्णय की तिथि: 30 जून, 2026

