पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत अपराध की वैधानिक धारणा तब तक लागू नहीं की जा सकती जब तक बुनियादी तथ्य संदेह से परे साबित न हों: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन शामिल थीं, ने एक आरोपी को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। आरोपी पर पॉक्सो एक्ट, 2012 की धारा 3(डी) (पैठ वाले यौन हमले) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376(2)(i) (बलात्कार) के तहत आरोप लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पॉक्सो कानून की धारा 29 के तहत दोषसिद्धि की वैधानिक धारणा (प्रिजम्पशन ऑफ गिल्ट) तब तक सक्रिय नहीं की जा सकती, जब तक कि अभियोजन पक्ष के बुनियादी तथ्य पूरी तरह से संदेह से परे साबित न हो जाएं। अदालत ने पाया कि इस मामले में अभियोजन की कहानी गंभीर अंतर्विरोधों, घटना की जानकारी देने में अत्यधिक देरी और मेडिकल या स्वतंत्र गवाहों के समर्थन के अभाव से घिरी हुई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह घटना 23 फरवरी, 2014 को रात करीब 9:00 बजे दिल्ली के वजीरपुर स्थित पीड़िता के घर पर हुई थी। पीड़िता (जो एक नाबालिग थी) घर में खाना बना रही थी, तभी उसके रिश्ते के ताऊ ने घर में प्रवेश किया और उसके छोटे भाइयों को बाहर भेज दिया। इसके बाद आरोपी ने पीड़िता के साथ जबरदस्ती की, उसका मुंह कपड़े से बंद कर दिया और उसके निजी अंगों के साथ छेड़छाड़ की।

कहानी के अनुसार, इसी दौरान पीड़िता के पिता वहां पहुंचे और उन्होंने आरोपी को रंगे हाथ पकड़कर थप्पड़ मारा। शोर सुनकर पड़ोसी भी जमा हो गए और उन्होंने आरोपी की पिटाई की, जिसके बाद वह वहां से भागने में सफल रहा।

हालांकि, घटना के तुरंत बाद पुलिस कंट्रोल रूम को की गई कॉल में केवल स्थानीय डिस्पेंसरी के पास “झगड़ा” होने की सूचना दर्ज कराई गई थी (डीआई नंबर 25पीपी)। जब पुलिस उसी रात मौके पर पहुंची, तो पीड़िता के पिता ने लिखित बयान में कहा कि यह उनका “पारिवारिक मामला” है और वे इसे आपस में सुलझाना चाहते हैं।

इसके अगले दिन, 24 फरवरी, 2014 को पीड़िता अपनी मां के साथ अशोक विहार पुलिस स्टेशन पहुंची, जहां उसका बयान दर्ज किया गया और प्राथमिकी (एफआईआर संख्या 115/2014) दर्ज की गई। ट्रायल कोर्ट ने 2 मार्च, 2016 को दिए अपने फैसले में आरोपी को बरी कर दिया था। कोर्ट ने माना था कि घटना की जानकारी देने में बिना किसी ठोस कारण के देरी की गई और दोनों पक्षों के बीच एक किराए की झुग्गी को लेकर पुराना विवाद भी चल रहा था, जिसके कारण आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया।

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दोनों पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (राज्य सरकार) की दलीलें अतिरिक्त लोक अभियोजक (एपीपी) ने दलील दी कि पीड़िता ने जांच और अदालत में गवाही के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी का पूरी तरह से समर्थन किया है। राज्य सरकार का तर्क था कि पीड़िता के पिता ने खुद घटनास्थल पर पहुंचकर घटना को देखा था, इसलिए उनकी गवाही एक चश्मदीद गवाह के रूप में बेहद महत्वपूर्ण है।

राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी को बहुत अधिक तवज्जो देकर गलती की है। चूंकि आरोपी परिवार का करीबी सदस्य था, इसलिए परिवार का शुरुआत में हिचकिचाना स्वाभाविक था। एपीपी ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह और अन्य (1996) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यौन उत्पीड़न के मामलों में केवल पीड़िता की विश्वसनीय गवाही के आधार पर भी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।

प्रत्यर्थी (आरोपी) की दलीलें आरोपी के वकील ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला विरोधाभासों और अस्पष्ट देरी के कारण पूरी तरह से कमजोर पड़ चुका था। बचाव पक्ष ने ध्यान दिलाया कि पीड़िता ने समय के साथ अपने बयानों में कई बड़े सुधार किए। उदाहरण के लिए, शुरुआत में पुलिस को दिए गए बयान में आरोपी के शराब के नशे में होने या पीड़िता को कपड़े और खाने-पीने का लालच देने जैसी बातें बिल्कुल गायब थीं, जिन्हें बाद में जोड़ा गया।

इसके अलावा, बचाव पक्ष ने पीड़िता और उसके पिता के बयानों में एक बड़े विरोधाभास की ओर इशारा किया। पिता ने दावा किया कि जब वे पहुंचे, तो कमरे का लकड़ी का दरवाजा बाहर से लोहे की कील (कीलनुमा बोल्ट) से बंद था जिसे उन्होंने खोला, जबकि पीड़िता ने अपनी जिरह में स्पष्ट रूप से कहा कि घटना के समय दरवाजा खुला हुआ था। अंत में, यह भी तर्क दिया गया कि परिवार ने आरोपी के बेटे पर एक झुग्गी खाली कराने का दबाव बनाने के लिए यह झूठा मामला दर्ज कराया था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने बरी किए जाने के मामलों में अपीलीय अदालतों के हस्तक्षेप से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आलोक में इस मामले का मूल्यांकन किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले मल्लप्पा बनाम कर्नाटक राज्य (2024) का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत को बरी करने के आदेश में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब तक कि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण पूरी तरह से अतार्किक, असंभव या साक्ष्यों के विपरीत न हो।

अदालत ने माना कि हालांकि स्कूल के रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि घटना के दिन पीड़िता नाबालिग थी, लेकिन केवल उम्र साबित होने से यह साबित नहीं हो जाता कि अपराध वास्तव में घटित हुआ था।

पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत दोषसिद्धि की वैधानिक धारणा पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा: “पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत धारणा केवल तभी उत्पन्न होगी जब ऐसे बुनियादी तथ्य सिद्ध हो जाएं और इसका उपयोग अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में मौजूद गंभीर कमियों को भरने के लिए नहीं किया जा सकता है।”

अदालत ने कहा कि हालांकि पीड़िता की अकेली गवाही पर दोषसिद्धि संभव है यदि वह पूरी तरह विश्वसनीय हो, लेकिन इस मामले में मौखिक साक्ष्य बेहद कमजोर और विरोधाभासी थे। पुलिस को दिए पहले बयान, धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान और अदालत की गवाही की तुलना करने पर अदालत ने पाया कि पीड़िता के बयानों में कई नई बातें जोड़ी गईं, जिससे उसकी विश्वसनीयता प्रभावित हुई।

इसके अलावा, पिता के चश्मदीद होने का दावा भी उनके शुरुआती पुलिस बयान (Ex.PW-7/DA) के कारण कमजोर हो गया, जिसमें उन्होंने यह नहीं बताया था कि उन्होंने दरवाजा कैसे खोला या अपनी बेटी को बिस्तर पर किस स्थिति में देखा। घटना की रात पिता के आचरण पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा: “पहली बार उपलब्ध अवसर पर पुलिस को इसकी जानकारी न देना, और उनका यह बयान कि यह मामला केवल एक पारिवारिक झगड़ा था जिसे वे आपस में सुलझाना चाहते थे, उनके इस दावे से मेल नहीं खाता कि उन्होंने इस कथित घटना को खुद अपनी आंखों से देखा था।”

अदालत ने रेखांकित किया कि मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों और पीसीआर कर्मियों के रिकॉर्ड के अनुसार, शुरुआती सूचना केवल एक पारिवारिक झगड़े के बारे में थी। हाईकोर्ट ने देरी के संबंध में टिप्पणी की: “प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने में देरी को, विशेष रूप से यौन अपराधों से जुड़े मामलों में, केवल इस आधार पर घातक नहीं माना जा सकता यदि देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण दिया गया हो। हालांकि, वर्तमान मामला केवल देरी से रिपोर्ट दर्ज कराने का नहीं है।”

अदालत ने स्वतंत्र सार्वजनिक गवाहों को शामिल न किए जाने पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की, जबकि यह स्वीकार किया गया था कि घटना के समय पड़ोसी जमा हो गए थे और उन्होंने आरोपी की पिटाई भी की थी। पेरियासामी बनाम राज्य (2024) (जिसमें राजस्थान राज्य बनाम कल्की का संदर्भ दिया गया है) का उल्लेख करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि जब गवाह आपस में रिश्तेदार या मामले में रुचि रखने वाले हों, तो स्वतंत्र गवाहों की गवाही का महत्व बहुत बढ़ जाता है। हाईकोर्ट ने कहा: “अभियोजन पक्ष द्वारा ऐसे किसी भी गवाह का परीक्षण न कराए जाने से अदालत को इस घटना के घटित होने के संबंध में कोई स्वतंत्र आश्वासन नहीं मिल पाता है और इससे अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर संदेह और गहरा हो जाता है।”

मेडिकल साक्ष्यों के मोर्चे पर, अदालत ने पाया कि पीड़िता की मां द्वारा आंतरिक स्त्री रोग संबंधी जांच (इंटरनल गायनेकोलॉजिकल एग्जामिनेशन) से इनकार किए जाने के कारण मामले में कोई भी फोरेंसिक या मेडिकल साक्ष्य उपलब्ध नहीं था। संपूर्ण साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट ने कहा: “यह अदालत पाती है कि इस मामले में संदेह कोई काल्पनिक नहीं है, बल्कि अभियोजन पक्ष के अपने साक्ष्यों से ही उत्पन्न होता है।”

निर्णय

दिल्ली हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी को संदेह का लाभ देने का ट्रायल कोर्ट का फैसला रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर पूरी तरह से तर्कसंगत और संभव था। अपीलीय अदालत के पास ट्रायल कोर्ट के इस बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस या बाध्यकारी कारण मौजूद नहीं है। नतीजतन, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और 2 मार्च, 2016 के बरी करने के फैसले को बरकरार रखा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: राज्य बनाम फूल चंद
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 157/2018
पीठ: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह, जस्टिस मधु जैन
निर्णय की तिथि: 7 जुलाई, 2026

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