बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने साल 2021 में नांदेड़ जिले में एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से जान गंवाने वाले दो मजदूरों के परिवारों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह दोनों पीड़ित परिवारों को 30-30 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करे। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने हाथ से मैला ढोने (मैनुअल स्केवेंजिंग) की प्रथा के जारी रहने पर कड़ा रुख अपनाया और इसे सभ्य समाज पर एक गंभीर कलंक करार दिया।
जस्टिस नितिन बी. सूर्यवंशी और जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव की पीठ ने यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने राज्य के सामाजिक न्याय विभाग को निर्देश दिया है कि नांदेड़ जिला कलेक्टर से औपचारिक प्रस्ताव मिलने के आठ सप्ताह के भीतर मुआवजे की राशि जारी कर दी जाए। इसके साथ ही पीठ ने चेतावनी दी है कि यदि मुआवजे के भुगतान में किसी भी तरह की देरी होती है, तो इस राशि पर 6 प्रतिशत की दर से वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
मानवीय गरिमा और संवैधानिक मूल्यों पर गहरी चिंता
पीठ ने 6 जुलाई के अपने फैसले में कहा कि स्पष्ट संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक दिशा-निर्देशों के बावजूद देश में हाथ से मैला ढोने जैसी अमानवीय प्रथा का जारी रहना हमारे सिस्टम की सामूहिक विफलता को दर्शाता है। जजों ने कहा कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली ये मौतें समाज को यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम समानता, गरिमा और बंधुत्व के संवैधानिक सपनों को अमलीजामा पहनाने में कितने सफल हो पाए हैं।
यह पूरा मामला पीड़ित परिवारों की ओर से दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सामने आया है। पहली याचिका एक 32 वर्षीय विधवा महिला की है, जिसके पति की इस हादसे में जान चली गई थी। मृतक एक मछुआरा था जो जरूरत पड़ने पर निर्माण और अन्य मजदूरी भी करता था। वह अपने पीछे पत्नी और नौ साल का बेटा छोड़ गया, जो पूरी तरह उसी पर निर्भर थे। पति की मौत के बाद अब उनकी पत्नी को खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करके गुजारा करना पड़ रहा है। दूसरी याचिका एक 70 वर्षीय बुजुर्ग मां की है, जिनके बेटे की इस हादसे में मौत हुई थी। मृतक बेटा निर्माण कार्य में दिहाड़ी मजदूर था और उसके जाने के बाद अब वृद्ध माता-पिता अपने छोटे बेटों की कमाई पर निर्भर हैं।
मुआवजे की जिम्मेदारी को लेकर कानूनी बहस
हादसे के शिकार दोनों मजदूरों की मौत निजी परिसर में बने एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने और पानी में डूबने के कारण हुई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रही वकील आभा सिंह ने कोर्ट को बताया कि दोनों मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के सेप्टिक टैंक में उतरे थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित संपत्ति के मालिक के पास स्थानीय प्रशासन से सफाई कार्य कराने की कोई अनुमति नहीं थी। आभा सिंह ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सफाई कर्मचारी आंदोलन मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के तहत 10-10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग को लेकर जिला कलेक्टर को आवेदन दिया गया था, लेकिन प्रशासन ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया, जिससे पीड़ित परिवार गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।
दूसरी ओर, सरकारी वकील पी. के. लखोटिया ने सरकार की जिम्मेदारी का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि दिसंबर 2019 के एक सरकारी प्रस्ताव (जीआर) के तहत, यदि काम किसी निजी संपत्ति पर व्यक्तिगत स्तर पर किया गया हो, तो मुआवजे के भुगतान की पूरी जिम्मेदारी निजी संपत्ति के मालिक की होती है।
हालांकि, संपत्ति के मालिक के वकील जी. आर. इंगोले ने स्पष्ट किया कि उनके मुवक्किल ने जिला कलेक्टर के एक निर्देश के बाद 2022 में ही दोनों परिवारों को 2.25-2.25 लाख रुपये की सहायता राशि दे दी थी। उन्होंने तर्क दिया कि मुआवजे की अंतिम जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों की ही बनती है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के पिछले फैसलों का अध्ययन करने के बाद, अदालत ने राज्य सरकार को 30-30 लाख रुपये का मुआवजा देने का अंतिम आदेश दिया। इसके अलावा, हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 12 हफ्तों के भीतर जांच करें कि क्या पीड़ित परिवार ‘मैला ढोने वाले नियोजन निषेध और पुनर्वास अधिनियम’ (PEMSR Act) के तहत पुनर्वास सहायता पाने के हकदार हैं, और पात्रता पाए जाने पर उनका पुनर्वास सुनिश्चित करें।

