इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा के एक व्यक्ति के खिलाफ जारी एक साल के प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी प्राधिकारी कोर्ट द्वारा मंजूर की गई जमानत को निष्प्रभावी करने के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन कानून का मनमाना इस्तेमाल नहीं कर सकते। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने अपने फैसले में निवारक हिरासत को एक बेहद सख्त कानून बताते हुए कहा कि यह किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीधे प्रभावित करता है। इसलिए, डिटेनिंग अथॉरिटी को इसका उपयोग करते समय अत्यधिक सावधानी और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
यह आदेश आगरा निवासी एक व्यक्ति की याचिका पर आया है। याचिकाकर्ता का आरोप था कि एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स ने उसे अवैध रूप से हिरासत में रखा, कई झूठे मुकदमों में फंसाया और फिर हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद उसे जेल में ही रोके रखने के लिए बिना किसी ठोस आधार के यह डिटेंशन ऑर्डर जारी कर दिया।
मामले की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि जिला मजिस्ट्रेट, केंद्र सरकार या राज्य के एडवाइजरी बोर्ड में से किसी ने भी इस हिरासत को लेकर कोई तार्किक या स्पष्ट कारण दर्ज नहीं किया। कोर्ट ने अधिकारियों के इस रवैये को ‘दिमाग का इस्तेमाल न करना’ (नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड) करार दिया। बेंच ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता के ड्रग्स से जुड़े पुराने मुकदमों के अलावा प्रशासन के पास उसकी निरंतर हिरासत को सही ठहराने का कोई नया या ठोस आधार मौजूद नहीं था।
अवैध गिरफ्तारी और झूठे दावों के आरोप
अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, याचिकाकर्ता 21 अक्टूबर 2024 को शाम करीब 5:45 बजे एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स के एक सदस्य के साथ कार से जा रहा था, तभी उसकी गाड़ी को जबरन रोककर उसे पकड़ लिया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसे दो दिनों तक अवैध हिरासत में रखा गया। इसके विपरीत, टास्क फोर्स ने कागजी कार्रवाई में उसकी गिरफ्तारी आगरा जिले के एक स्थानीय थाने के पास मौके से (स्पॉट डिटेंशन) दिखाई।
याचिकाकर्ता के वकीलों, अजय कुमार पांडेय और अर्नव द्विवेदी ने कोर्ट में दलील दी कि टास्क फोर्स की कहानी पूरी तरह झूठी है। घटना के सीसीटीवी फुटेज से साफ है कि पुलिसकर्मियों ने याचिकाकर्ता को गैर-कानूनी ढंग से पकड़ा और जबरन अपने साथ ले गए। जब याचिकाकर्ता इस मामले में जेल में था, तभी टास्क फोर्स ने उसके खिलाफ यूपी गैंगस्टर एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 के तहत एक और मुकदमा दर्ज कर दिया। बाद में हाईकोर्ट ने उसे दोनों ही मामलों में जमानत दे दी थी।
हिरासत आदेश का पूरा घटनाक्रम
सभी मामलों में जमानत मिलने के बावजूद, आगरा जिला जेल में बंद याचिकाकर्ता को 20 अगस्त 2025 को प्रिवेंटिव डिटेंशन का एक साल का आदेश थमा दिया गया। याचिकाकर्ता ने 27 अगस्त 2025 को जेल अधीक्षक के माध्यम से इस आदेश के खिलाफ अपना विरोध-पत्र (अभ्यावेदन) प्रस्तुत किया।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 अक्टूबर 2025 को उसके इस अभ्यावेदन को खारिज कर दिया। इसके तीन दिन बाद, यानी 17 अक्टूबर को राज्य के एडवाइजरी बोर्ड ने बिना कोई लिखित कारण बताए एकतरफा (एक्स-पार्टी) सुनवाई में इस डिटेंशन ऑर्डर पर अपनी मुहर लगा दी।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस डिटेंशन ऑर्डर को पूरी तरह अनुचित ठहराया। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों का यह दायित्व है कि वे प्रिवेंटिव डिटेंशन के मामलों की बेहद बारीकी से जांच करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि नागरिक की स्वतंत्रता के साथ गैर-कानूनी खिलवाड़ न हो। बेंच ने साफ किया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन का उपयोग नियमित आपराधिक कानून या दंडात्मक कार्रवाई के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता, और न ही इसे जमानत के आदेशों को बेअसर करने का जरिया बनाया जा सकता है।
दूसरी ओर, सरकार की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता कुलदीप कुमार ने हिरासत के फैसले को सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता ड्रग्स के मामलों का आदतन अपराधी है और जिला मजिस्ट्रेट, राज्य सरकार तथा एडवाइजरी बोर्ड ने नियमों के तहत ही हिरासत की पुष्टि की है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रशासन के इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इस पूरी कार्रवाई का एकमात्र उद्देश्य याचिकाकर्ता को अदालत से जमानत मिलने के बावजूद लंबे समय तक जेल में बंद रखना था।

