लोन चुकाने के बाद भी नहीं लौटाए जमीन के कागजात, उपभोक्ता आयोग ने फेडरल बैंक के मैनेजर पर लगाया 2.5 लाख रुपये का जुर्माना

केरल के एक उपभोक्ता आयोग ने फेडरल बैंक की पुदुनगरम शाखा के मैनेजर को सेवा में गंभीर कमी का दोषी पाया है। आयोग ने बैंक द्वारा ग्राहक के लोन खाते बंद होने के बाद भी उसके मूल संपत्ति दस्तावेजों को लगभग 16 महीने तक रोके रखने पर यह कार्रवाई की है। आयोग ने शाखा प्रबंधक को पीड़ित ग्राहक को कुल 2.5 लाख रुपये का मुआवजा और कानूनी खर्च का भुगतान करने का आदेश दिया है।

यह फैसला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष विनय मेनन वी, सदस्य विद्या ए और कृष्णनकुट्टी एनके की पीठ ने शबीना एमए नामक महिला की शिकायत पर सुनाया। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि ग्राहक का लोन खाता 22 मार्च 2023 को बंद हो गया था, लेकिन इसके बावजूद बैंक ने मूल टाइटिल डीड (संपत्ति के दस्तावेज) को करीब एक साल और चार महीने तक अपने पास दबाए रखा। बैंक इस अत्यधिक देरी का कोई ठोस कारण बताने में असमर्थ रहा, जिसके बाद आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि दस्तावेजों को रोके रखने का यह कदम पूरी तरह से मनमाना और अवैध था।

दो ऋण और दस्तावेजों को बंधक बनाने का विवाद

शिकायतकर्ता शबीना ने बताया कि उन्होंने साल 2016 में संकटग्रस्त किसानों की सहायता के लिए चलाई जा रही ‘प्रत्यशा लोन योजना’ के तहत फेडरल बैंक से कर्ज लिया था। इसके लिए उन्होंने अपनी संपत्ति के असली दस्तावेज बैंक के प्रबंध निदेशक के पास जमा कराए थे। उन्होंने साल 2021 में बिना किसी चूक के इस पूरे कर्ज का भुगतान कर दिया और खाता बंद करा दिया। इसके बाद, साल 2019 में उन्होंने इसी शाखा से ‘प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम’ (PMEGP) के तहत एक और लोन लिया, जिसके लिए बैंक ने पहले से जमा दस्तावेजों को ही दोबारा सुरक्षा (कॉलैटरल) के रूप में इस्तेमाल कर लिया।

शबीना का आरोप है कि बाद में उन्हें जानकारी मिली कि 10 लाख रुपये से कम के लोन के लिए किसी भी तरह के दस्तावेज गिरवी रखने की कानूनी बाध्यता नहीं होती है। लेकिन जब उन्होंने अपने कागजात वापस मांगे, तो बैंक अधिकारियों ने उन्हें कथित तौर पर डराया कि यदि वे दस्तावेज वापस लेंगी, तो उन्हें PMEGP योजना के तहत मिलने वाली सरकारी सब्सिडी का लाभ नहीं मिलेगा। लोन खाता पूरी तरह बंद हो जाने के बाद भी जब बैंक ने उनके दस्तावेज नहीं लौटाए, तो उन्होंने बैंक के मुख्य कार्यालय में भी शिकायत दर्ज कराई, लेकिन वहां से उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

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प्रधानमंत्री लोक शिकायत पोर्टल के हस्तक्षेप से मिले दस्तावेज

बैंक की टालमटोल से तंग आकर शबीना ने 19 जून 2024 को प्रधानमंत्री लोक शिकायत पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत के बाद फेडरल बैंक ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि शबीना के PMEGP लोन के एवज में कोई भी संपत्ति गिरवी नहीं रखी गई थी। इसके बाद बैंक ने उनके दस्तावेजों को दो चरणों में—18 जुलाई 2024 और 10 अगस्त 2024 को वापस लौटाया। इसके बाद शबीना ने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने वित्तीय नुकसान के लिए 4 लाख रुपये, मानसिक प्रताड़ना के लिए 2 लाख रुपये और कानूनी खर्च के रूप में 50,000 रुपये की मांग की।

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आयोग ने अन्य वित्तीय नुकसान के दावों को खारिज किया

आयोग ने दस्तावेजों को वापस लौटाने में हुई देरी को बैंक की गंभीर लापरवाही तो माना, लेकिन शबीना द्वारा किए गए अन्य वित्तीय नुकसान के दावों को स्वीकार नहीं किया। शबीना ने दलील दी थी कि दस्तावेजों के न होने के कारण वे अपनी बेटी की शादी के लिए संपत्ति नहीं बेच सकीं, जिसके चलते शादी का एक अच्छा रिश्ता हाथ से निकल गया और बाद में उन्हें अपनी दूसरी संपत्ति बहुत कम दाम में बेचनी पड़ी।

उपभोक्ता आयोग ने इन दावों को सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया और इन्हें महज कोरी कल्पना करार दिया। आयोग ने सवाल उठाया कि जब शादी साल 2023-2024 के दौरान होनी तय थी, तो शबीना ने साल 2021 में ही अपनी दूसरी संपत्ति क्यों बेच दी थी? आयोग ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहीं कि बैंक द्वारा कागजात रोके रखने से उनकी संपत्ति की कीमत में कमी आई थी। आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए शाखा प्रबंधक को आदेश दिया कि वे 45 दिनों के भीतर ग्राहक को 2 लाख रुपये का मुआवजा और 50,000 रुपये का कानूनी खर्च अदा करें।

बैंक का पक्ष: न्यूनतम बैलेंस विवाद के कारण की गई कार्रवाई

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फेडरल बैंक और उसके प्रबंध निदेशक की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता उल्लास सुधाकर ने बैंक की ओर से किसी भी तरह की लापरवाही या अवैध आचरण से साफ इनकार किया। उन्होंने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने अपनी मर्जी से ये दस्तावेज सुरक्षा के रूप में जमा कराए थे और अगस्त 2024 तक उन्हें सभी कागजात सुरक्षित वापस सौंप दिए गए थे।

बैंक का दावा था कि यह शिकायत केवल बदले की भावना से दर्ज कराई गई है। बैंक के अनुसार, असल विवाद ग्राहक के खाते से न्यूनतम बैलेंस न रखने के कारण काटे गए जुर्माने को लेकर था, जिससे ध्यान भटकाने के लिए ग्राहक ने यह मामला दर्ज कराया है। बैंक ने किसी भी प्रकार की सेवा में कमी से इनकार करते हुए शिकायत को पूरी तरह खारिज करने की मांग की थी।

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