दिल्ली दंगा पीड़ितों को मुआवजा: हाईकोर्ट ने भुगतान रोकने की सरकार की अपील खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2020 के उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगों के पीड़ितों को लगभग 21 करोड़ रुपये का मुआवजा बांटने के अपने आदेश को वापस लेने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायाधीश तेजस कारिया की खंडपीठ ने सोमवार को इस मामले में दिल्ली सरकार की अपील का निपटारा कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने पूर्व के फैसलों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन राज्य सरकार को जनवरी 2025 के मूल भुगतान आदेश को औपचारिक रूप से चुनौती देने की छूट दी है।

यह मुआवजा उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगा दावा आयोग (एनइडीआरसीसी) की सिफारिशों के आधार पर दिया जाना है, जिसका गठन अप्रैल 2020 में किया गया था। आयोग ने दंगों के बाद पीड़ितों द्वारा किए गए लगभग 153.69 करोड़ रुपये के कुल दावों के मुकाबले करीब 21.71 करोड़ रुपये बांटने की सिफारिश की थी। फरवरी 2020 में भड़की इस हिंसा में कम से कम 53 लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।

दंगाइयों से वसूली की दलील और कोर्ट के सवाल

सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार का पक्ष रखते हुए वकील समीर वशिष्ठ ने सुप्रीम कोर्ट के साल 2009 के एक फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि दंगों में हुए नुकसान और मौतों की वित्तीय जिम्मेदारी सरकार पर नहीं, बल्कि हिंसा भड़काने वाले और नुकसान पहुंचाने वाले असली गुनहगारों पर होनी चाहिए।

इस दलील पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि पीड़ित खुद नुकसान की भरपाई के लिए दंगाइयों को ढूंढने नहीं जा सकते। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या उसने दोषियों से इस नुकसान की वसूली के लिए कोई ठोस व्यवस्था या तंत्र तैयार किया है? इस पर सरकारी वकील ने स्वीकार किया कि फिलहाल ऐसा कोई तंत्र तैयार नहीं है और आरोपियों के खिलाफ अदालत में मुकदमे अभी भी चल रहे हैं।

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राजनीतिक बदलाव और कानूनी विवाद का घटनाक्रम

इस पूरे मामले का कानूनी विवाद जनवरी 2025 से जुड़ा है। 15 जनवरी 2025 को हाईकोर्ट के एक एकल न्यायाधीश ने सरकार को मुआवजा राशि जारी करने का आदेश दिया था। उस वक्त सत्ता में रही आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस आदेश का विरोध नहीं किया था।

इसके बाद फरवरी 2025 में दिल्ली में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद रुख बदल गया। सरकार ने सितंबर 2025 में एकल न्यायाधीश के सामने अर्जी देकर इस आदेश को वापस लेने की मांग की। सरकार ने दावा किया कि उनके वकील ने गलती से और वरिष्ठ अधिकारियों की अनुमति के बिना ही कोर्ट में ‘अनापत्ति’ दे दी थी।

इस साल 7 मई को एकल न्यायाधीश ने सरकार की इस अर्जी को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि ‘अनजाने में हुई गलती’ का दावा भरोसेमंद नहीं लगता और अर्जी दाखिल करने में काफी देरी की गई है। सरकार ने इसी फैसले के खिलाफ अपील की थी, जिसे अब खंडपीठ ने निपटा दिया है।

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अवमानना की कार्रवाई से बचने के आरोप

पीड़ितों की ओर से पेश वकील चिरायु जैन ने सोमवार को अदालत में सरकार की अपील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि केवल अवमानना की कार्रवाई से बचने के लिए सरकार बार-बार यह याचिकाएं दायर कर रही है। उन्होंने कहा कि फरवरी में सरकार बदलने के बाद केवल राजनीतिक बदलाव के कारण सरकार ने इस मामले में अपना पुराना रुख पूरी तरह बदल लिया है।

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