सरकार की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन और नारेबाजी तड़ीपारी का आधार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस द्वारा एक राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ जारी एक साल के तड़ीपारी (एक्सटर्नमेंट) के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के फैसलों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना या नारेबाजी करना किसी नागरिक को उसके घूमने-फिरने की आजादी के संवैधानिक अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता।

जस्टिस माधव जे. जामदार की एकल पीठ ने पुलिस विभाग की इस कार्रवाई को गलत इरादे से प्रेरित और कानूनन अमान्य बताया। हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को सचेत करते हुए कहा कि वे जनता के सेवक हैं, न कि सरकार के बड़े पदाधिकारियों के इशारे पर काम करने वाले टूल। अदालत ने जोर देकर कहा कि अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीवन जीना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकार हैं।

यह फैसला सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के 49 वर्षीय महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की याचिका पर आया है। चौधरी ने चेंबूर क्षेत्र के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) जोन 6 द्वारा 3 दिसंबर 2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें एक साल के लिए क्षेत्र से बाहर (तड़ीपार) कर दिया गया था।

पुलिस की कार्रवाई को दी चुनौती

चौधरी के खिलाफ अक्टूबर 2025 में कारण बताओ नोटिस जारी कर तड़ीपारी की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके लिए पुलिस ने साल 2019 से 2024 के बीच दर्ज कई एफआईआर को आधार बनाया था। ये मामले उन प्रदर्शनों से जुड़े थे जिनमें चौधरी ने हिस्सा लिया था या उनका आयोजन किया था। इन प्रदर्शनों में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), एनआरसी, बाबरी मस्जिद विवाद, ज्ञानवापी मस्जिद को सील करने और हालिया परीक्षा पेपर लीक जैसे मुद्दों पर सरकार का विरोध किया गया था।

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अदालत में चौधरी का पक्ष रख रहे वकील पायोशी रॉय और इब्राहिम हरबत ने दलील दी कि पुलिस की इस कार्रवाई का मकसद याचिकाकर्ता को आगामी निकाय चुनावों से दूर रखना था, ताकि वैध लोकतांत्रिक विरोध की आवाज को दबाया जा सके।

कानूनी आधार का अभाव

याचिकाकर्ता की कानूनी टीम ने ध्यान दिलाया कि चौधरी के खिलाफ दर्ज सभी पुराने मामले आईपीसी की धारा 188 (सरकारी कर्मचारी के आदेश की अवज्ञा) के तहत थे, जिसमें अधिकतम एक महीने की जेल का प्रावधान है। वकीलों ने तर्क दिया कि ये छोटे मामले महाराष्ट्र पुलिस एक्ट की धारा 56 के मानकों को पूरा नहीं करते। इस धारा के तहत तड़ीपारी की सख्त कार्रवाई तभी की जा सकती है जब किसी व्यक्ति की हरकतों से जनता या संपत्ति को तत्काल खतरा या नुकसान पहुंचने की आशंका हो।

जस्टिस जामदार ने बचाव पक्ष के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि चौधरी की गतिविधियों से सार्वजनिक सुरक्षा को कोई खतरा था। उन्होंने सवाल उठाया कि प्रदर्शनों के दौरान ‘भाजपा सरकार मुर्दाबाद’ या ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाने मात्र से किसी नागरिक को तड़ीपार जैसी सख्त कार्रवाई का सामना क्यों करना पड़े।

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राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया था कि पुलिस की अनुमति के बिना प्रदर्शन किए जाने के कारण यह कार्रवाई कानून के अनुसार थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए निष्कर्ष निकाला कि केवल सरकार की नीतियों का विरोध करने पर किसी नागरिक के स्वतंत्र रूप से आने-जाने और सम्मान से जीने के अधिकार को नहीं छीना जा सकता।

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