कर्नाटक हाईकोर्ट ने ऑन्कोलॉजिस्ट के खिलाफ जालसाजी का आपराधिक मामला रद्द किया, कहा- अस्पतालों के आपसी विवाद में डॉक्टरों को बलि का बकरा न बनाएं

कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु के एक ऑन्कोलॉजिस्ट के खिलाफ कथित तौर पर अनुभव प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर जालसाजी करने के आरोप में दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा है कि इस मामले को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने डॉ. सोमशेखर एस. पी. की याचिका स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत जालसाजी और जाली दस्तावेज के इस्तेमाल से जुड़े आरोपों में जारी समन को निरस्त कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद तब शुरू हुआ जब डॉ. सोमशेखर ने लगभग 20 वर्ष तक सेवाएं देने के बाद मणिपाल हॉस्पिटल से इस्तीफा देकर एस्टर डीएम हेल्थकेयर जॉइन किया।

मणिपाल हॉस्पिटल का कहना था कि 8 नवंबर 2022 से 21 नवंबर 2022 के बीच उसे डेटाफ्लो सर्विसेज की ओर से एक ईमेल प्राप्त हुआ, जिसमें डॉ. सोमशेखर के नाम पर जारी कथित अनुभव प्रमाणपत्र का सत्यापन मांगा गया था। अस्पताल ने दावा किया कि उसने ऐसा कोई अनुभव प्रमाणपत्र जारी नहीं किया था और प्रमाणपत्र पर मौजूद हस्ताक्षर जाली थे।

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इसी आधार पर अस्पताल ने मजिस्ट्रेट अदालत में निजी शिकायत दायर की।

पुलिस जांच और मजिस्ट्रेट का आदेश

पुलिस ने जांच के बाद बी रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा कि मामले में कोई अपराध नहीं बनता। हालांकि, मणिपाल हॉस्पिटल ने इस रिपोर्ट को चुनौती देते हुए प्रोटेस्ट याचिका दायर की।

इसके बाद मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिपोर्ट स्वीकार नहीं की, शिकायत का संज्ञान लिया और डॉ. सोमशेखर को जालसाजी तथा जाली दस्तावेज के उपयोग से जुड़े आरोपों में समन जारी कर दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए डॉक्टर ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह अत्यंत चिंताजनक है कि जिस अस्पताल में याचिकाकर्ता ने 20 वर्ष से अधिक समय तक सेवाएं दीं, वही अब उन पर ऐसे अनुभव प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर जालसाजी का आरोप लगा रहा है, जिसकी उन्हें स्वयं आवश्यकता भी नहीं थी।

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अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा दाखिल बी रिपोर्ट स्वीकार कर मामले का समापन कर दिया जाना चाहिए था। साथ ही यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने बी रिपोर्ट के साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार किए बिना शिकायत का संज्ञान लेकर और समन जारी कर त्रुटि की।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी कार्यवाही जारी रहने देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय का गंभीर हनन होगा।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागप्रसन्ना ने मौखिक रूप से कहा कि डॉक्टरों को मरीजों का इलाज करने दिया जाना चाहिए और उन्हें अस्पतालों के आपसी विवादों में नहीं घसीटना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि निजी विवादों में डॉक्टरों को बलि का बकरा नहीं बनाया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मणिपाल हॉस्पिटल को उदारता दिखानी चाहिए थी और उस दस्तावेज को नजरअंदाज कर देना चाहिए था, क्योंकि याचिकाकर्ता ने लगभग 20 वर्षों तक अस्पताल की सेवा की थी।

दुर्भावनापूर्ण अभियोजन की अनुमति नहीं

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हालांकि हाईकोर्ट ने डॉ. सोमशेखर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी, लेकिन मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए उन्हें शिकायतकर्ता के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण अभियोजन की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

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