गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम के कोकराझार जिले में वर्ष 2021 में दो नाबालिग लड़कियों के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के मामले में तीन दोषियों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तीनों दोषियों को अपने शेष प्राकृतिक जीवन काल तक जेल में ही रहना होगा।
चीफ जस्टिस आशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा भेजे गए डेथ रेफरेंस (मृत्युदंड पुष्टि संदर्भ) का उत्तर नकारात्मक देते हुए तीनों दोषियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो सके कि दोषी सुधार अथवा पुनर्वास की संभावनाओं से पूरी तरह परे हैं।
सुधार की संभावना खत्म होने का ठोस प्रमाण नहीं: हाईकोर्ट
सजा के कानूनी ढांचे पर 10 सितंबर को टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि केवल अपराध की क्रूरता के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दोषी के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। अदालत ने रेखांकित किया कि सजा तय करने की प्रक्रिया अनुमानों पर नहीं, बल्कि पुख्ता साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए। अदालत के समक्ष मौजूद दस्तावेज ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की अनुमति नहीं देते।
अदालत ने माना कि अपराध असाधारण रूप से गंभीर है और सजा में इस गंभीरता की झलक दिखनी चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि दोषियों को फांसी पर लटकाने के बजाय जीवन के अंतिम सांस तक जेल में रखना ही न्याय के दृष्टिकोण से उचित संतुलन बनाता है।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य और डीएनए रिपोर्ट बने जांच का आधार
यह पूरा मामला 11 जून 2021 की उस घटना से जुड़ा है, जब कोकराझार जिले के एक वन क्षेत्र में 14 और 16 वर्ष की दो नाबालिग लड़कियों के शव एक पेड़ से लटके पाए गए थे। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने शुरुआत में अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया। इसके बाद हत्या और आपराधिक साजिश की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने दोनों किशोरियों के साथ जबरन दुष्कर्म किया, उनका गला घोंटकर जान ले ली और मामले को आत्महत्या दिखाने के इरादे से दोनों शवों को पेड़ से लटका दिया। पोस्टमार्टम जांच ने भी इस बात की पुष्टि की कि दोनों लड़कियों की मृत्यु गला घोंटने के कारण हुई थी और उनके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए थे।
घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी न होने के कारण अभियोजन ने अपनी जांच को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल टावर लोकेशन और फोरेंसिक रिपोर्ट पर केंद्रित रखा। इसमें सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य डीएनए प्रोफाइलिंग रहा, जिसमें मृतकाओं के शरीर से एकत्र जैविक नमूनों का मिलान तीनों आरोपियों से हुआ। अप्रैल 2022 में ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी और पुष्टिकरण के लिए मामला हाईकोर्ट भेजा था।
बचाव और अभियोजन पक्ष के बीच कानूनी बहस
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दोषियों के वकील आज़ाद अहमद ने दलील दी कि राज्य का पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर है और कोई चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि मोबाइल टावर लोकेशन से केवल यह पता चलता है कि आरोपी आसपास के इलाके में थे, लेकिन यह साबित नहीं होता कि वे सीधे घटनास्थल पर उपस्थित थे या उन्हें पीड़िताओं के साथ आखिरी बार देखा गया था। बचाव पक्ष ने जैविक नमूनों के संग्रह और रखरखाव में प्रक्रियात्मक त्रुटियों का आरोप लगाते हुए चेन ऑफ कस्टडी की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।
इसके विपरीत, पीड़ित परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता सरफराज़ नवाब ने दलील दी कि मेडिकल और डीएनए जांच के नतीजों ने गवाहों की कमी को पूरी तरह से पाट दिया है। मेडिकल रिपोर्ट ने यौन उत्पीड़न की पुष्टि की, जबकि डीएनए प्रोफाइलिंग ने प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत संलिप्तता सिद्ध कर दी।
सजा पर बहस करते हुए राज्य के वकील ने कहा कि दो नाबालिगों के साथ हुई इस बर्बरता ने परिवार को असहनीय पीड़ा दी है। हत्या के बाद शवों को पेड़ से लटकाना इस अपराध की गंभीरता को और बढ़ा देता है। उन्होंने दलील दी कि अदालत को पीड़ित परिवार के अधिकारों और अपराध की विभीषिका को ध्यान में रखते हुए मौत की सजा की पुष्टि करनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि नाबालिगों के साथ दुष्कर्म, गला घोंटकर हत्या और फिर उसे आत्महत्या का रूप देने की कोशिश अपराध के अत्यंत जघन्य चरित्र को दर्शाती है। हालांकि, अदालत ने जोड़ा कि दंड निर्धारित करते समय कानून अपराध के साथ-साथ अपराधी की परिस्थितियों पर भी विचार करने की मांग करता है, जिसके चलते रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्य मृत्युदंड जैसी अंतिम सजा के क्रियान्वयन का समर्थन नहीं करते।

