जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने भारतीय सेना को उत्तरी कश्मीर के सोपोर में करीब तीन एकड़ जमीन के लिए मालिकों को किराया देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि सेना को उस जमीन का भी किराया देना होगा जिसका औपचारिक रूप से अधिग्रहण नहीं किया गया था, लेकिन सुरक्षा बैरियरों और कंटीले तारों की वजह से जमीन मालिक उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे।
निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट की मंजूरी
जस्टिस संजय धर ने इस मामले में निचली अदालत के पहले के फैसले को सही ठहराते हुए निर्देश दिया कि सेना को स्थानीय किराया निर्धारण समिति (रेंट असेसमेंट कमेटी) द्वारा तय दरों पर जमीन मालिकों को भुगतान करना होगा। यह विवादित जमीन सोपोर के जलालाबाद इलाके में स्थित है, जो कुल मिलाकर लगभग 23 कनाल और 14 मरला (करीब तीन एकड़) है।
सुरक्षा बैरियरों के कारण उपजा कानूनी विवाद
इस पूरे कानूनी विवाद की मुख्य वजह सेना के नियंत्रण वाली जमीन का दायरा था। सेना का दावा था कि उसने आधिकारिक तौर पर केवल 0.75 एकड़ यानी 6 कनाल और 6 मरला जमीन का ही अधिग्रहण किया है। इसके विपरीत, जमीन मालिकों की दलील थी कि वे अपनी बाकी बची जमीन का भी इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। सेना ने सुरक्षा कारणों से इस गैर-अधिग्रहीत हिस्से की भी कंटीले तारों (कॉन्सर्टिना वायर) से घेरेबंदी कर दी थी, जिससे मालिकों का वहां जाना पूरी तरह बंद हो गया था।
सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय धर ने माना कि भले ही आधिकारिक रूप से सेना के पास कम जमीन थी, लेकिन उसके सुरक्षा उपायों ने मालिकों को उनकी बाकी बची हुई जमीन से भी पूरी तरह वंचित कर दिया। इसके मद्देनजर कोर्ट ने आदेश दिया कि सेना शेष 17 कनाल और 8 मरला जमीन का भी किराया देने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य है। इस अतिरिक्त हिस्से के किराए का आकलन भी उसी दर पर किया जाएगा, जो आधिकारिक तौर पर अधिग्रहीत किए गए हिस्से के लिए लागू है।
बीएसएफ से सेना तक जमीन का सफर
इस भूखंड पर सबसे पहले सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) का नियंत्रण था, जिसने बाद में इसे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को सौंप दिया था। इसके बाद साल 2011 में सेना ने सीआरपीएफ से इस जगह का नियंत्रण अपने हाथ में लिया। लंबे समय तक अपनी जमीन का कोई किराया न मिलने के कारण आखिरकार मालिकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

