अदालती टिप्पणियों के मीम बनाने और फर्जी वकीलों के मामले में सीबीआई जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सीबीआई से मांगा जवाब

अदालत की कार्यवाही के वीडियो काटकर मीम बनाने, उनका व्यावसायिक इस्तेमाल करने और फर्जी वकीलों की बढ़ती संख्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सीबीआई और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने एक याचिका पर यह कदम उठाया। याचिका में इन सभी मामलों की केंद्रीय जांच एजेंसी से पड़ताल कराने का अनुरोध किया गया है।

अदालती बयानों के व्यावसायिक इस्तेमाल पर रोक की मांग

अधिवक्ता राजा चौधरी की ओर से दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की मौखिक टिप्पणियों और रूपकों को संदर्भ से अलग करके सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है। याचिका में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम की संस्था से जुड़ी गतिविधियों, ट्रेडमार्क दावों, ब्रांडिंग अभियानों और डिजिटल सामग्री के जरिए की जा रही कमाई की जांच कराने का आग्रह किया गया है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि संविधान के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की आजादी, निष्पक्ष आलोचना, व्यंग्य और लोकतांत्रिक विरोध का वह पूरी तरह सम्मान करते हैं। हालांकि, सुनवाई के छोटे-छोटे टुकड़ों को काटकर इंटरनेट पर पैसे कमाने के उद्देश्य से फैलाना न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।

विवाद की मुख्य वजह और ‘कॉकरोच’ टिप्पणी

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इस पूरे मामले की शुरुआत 15 मई को हुई सुनवाई के दौरान हुई थी। उस समय शीर्ष अदालत में कानूनी पेशे के गिरते स्तर, वरिष्ठ अधिवक्ताओं के दर्जे और अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग पर चर्चा हो रही थी। इसी दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने सांकेतिक भाषा में ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया था।

बाद में एक बातचीत में मुख्य न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी पर स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया था कि यह बात उन लोगों के लिए कही गई थी जो फर्जी डिग्रियों के सहारे पिछले दरवाजे से वकालत के पेशे में आ गए हैं। उनका मकसद वकालत के पेशे को फर्जी डिग्रियों वाले लोगों से मुक्त करना और सुधार लाना था।

साहित्यिक और संवैधानिक संदर्भ की दलील

याचिका में दलील दी गई कि साहित्यिक और संवैधानिक बहसों में प्रतीकात्मक और रूपकात्मक भाषा का प्रयोग लंबे समय से होता आ रहा है। इतिहास में संस्थागत चिंताओं, प्रशासनिक व्यवस्था की कमियों और संचार के अभाव को व्यक्त करने के लिए ऐसे शब्दों का सहारा लिया जाता रहा है।

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याचिका में फ्रांस काफ्का के प्रसिद्ध उपन्यास ‘द मेटामॉर्फोसिस’ का उदाहरण देते हुए कहा गया कि उसमें भी कीड़े के प्रतीक का इस्तेमाल संस्थागत समस्याओं और अलगाव को दर्शाने के लिए किया गया था। इसी तरह भारतीय कानूनी परंपराओं में ‘जंगल राज’, ‘वॉचडॉग’ और ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ जैसे प्रतीकात्मक शब्दों का उपयोग होता रहा है, जिन्हें शाब्दिक अर्थों में लेने के बजाय उनके संदर्भ के साथ समझा जाना चाहिए।

फर्जी डिग्रियों और वकीलों की जांच का आग्रह

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डिजिटल मीडिया पर वीडियो प्रसारित किए जाने के अलावा याचिका में फर्जी लॉ डिग्रियों, फर्जी वकीलों, दूसरों की पहचान का इस्तेमाल कर वकालत करने और कानूनी पेशे में गिरते नैतिक मानकों पर भी चिंता जताई गई है। याचिका में मांग की गई है कि वकालत के पेशे की साख बनाए रखने के लिए इन सभी गड़बड़ियों की विस्तृत जांच कराई जाए।

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