दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महिला की उस याचिका पर केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है, जिसमें उसने अपने 14 वर्षीय दत्तक पुत्र की कस्टडी वापस लेने की गुहार लगाई है। महिला का कहना है कि गोद लेने के बाद बच्चा बौद्धिक रूप से अक्षम पाया गया और अब उसके अत्यधिक आक्रामक व अनियंत्रित आचरण के कारण पूरे परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने 17 सितंबर को इस मामले पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, कारा, संबंधित बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) और नाबालिग लड़के को नोटिस जारी किए। अदालत ने सभी पक्षों से याचिका पर अपना पक्ष रखने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर तय की है।
घर में महिलाओं की सुरक्षा पर संकट का हवाला
याचिका के अनुसार, महिला और उसके पति ने साल 2018 में कारा के माध्यम से इस बच्चे को कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद लिया था। बाद में सामने आया कि वह बौद्धिक रूप से अक्षम (इंटेलेक्चुअली डिसेबल्ड) है। साल 2021 में महिला के पति का निधन हो गया, जिसके बाद से पारिवारिक हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो गए। वर्तमान में वह अपनी बुजुर्ग मां और बहन के साथ रह रही हैं।
याचिका में कहा गया है कि किशोर का व्यवहार बेहद हिंसक और ‘हाइपरसेक्सुअल’ हो चुका है। इसके चलते घर की सभी महिला सदस्य निरंतर भय के साए में जीने को मजबूर हैं और उन्हें हमेशा इस बात की आशंका सताती रहती है कि वह उनके साथ कोई गंभीर दुर्व्यवहार न कर दे।
चोरी, हिंसा और स्कूलों से निष्कासन का इतिहास
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि जब भी किशोर को पैसे देने से मना किया जाता है या घर से नकदी व कीमती सामान चुराने से रोका जाता है, तो वह हिंसक रूप अख्तियार कर लेता है। लगातार अनुचित और आक्रामक व्यवहार के कारण उसे अब तक कई स्कूलों से भी निकाला जा चुका है।
याचिका में एक पूर्व घटना का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें नाबालिग ने एक अन्य महिला के साथ बदसलूकी की थी। इस मामले की शिकायत पुलिस तक पहुंची थी, हालांकि बाद में याचिकाकर्ता के आग्रह पर ही पुलिस जांच को बंद कराया गया था।
उपचार और कस्टडी के लिए लगाई गुहार
महिला ने स्पष्ट किया कि परिस्थितियों को देखते हुए अब अकेले उसके लिए किशोर की देखभाल करना मुमकिन नहीं रह गया है। उसने हाईकोर्ट से निर्देश देने की मांग की है कि लड़के की कस्टडी कारा या किसी अन्य उपयुक्त बाल कल्याणकारी संस्था को सौंपी जाए। इसके अलावा, याचिका में अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि वह कारा और बाल कल्याण समिति को किशोर के समुचित चिकित्सकीय इलाज और विशेष देखभाल की व्यवस्था करने का निर्देश दे।

