सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक विशेष सेल गठित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों और किशोरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए संशोधित कानून के प्रावधानों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह कानून के क्रियान्वयन की लगातार निगरानी करे और संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से प्रवर्तन एजेंसियों को आवश्यक निर्देश जारी करे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश गैर सरकारी संगठन हेल्थ फॉर मिलियंस (Health For Millions) की ओर से वर्ष 2009 में दाखिल याचिका का निपटारा करते हुए दिया। याचिका में पुराने कानून के तहत बच्चों को कुछ खतरनाक कार्यों में लगाए जाने की अनुमति देने वाले प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।
कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश
पीठ ने कहा कि वर्ष 2016 में किए गए विधायी संशोधनों से याचिकाकर्ता की मूल शिकायतों का काफी हद तक समाधान हो चुका है। हालांकि, इन प्रावधानों को पूरी तरह लागू करना अभी भी आवश्यक है।
कोर्ट ने बच्चों और किशोरों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक विशेष निगरानी सेल बनाने और राज्य स्तर पर कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करने का निर्देश दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि बाल एवं किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 और वर्ष 2016 के संशोधित प्रावधानों का पूर्ण एवं सख्त अनुपालन सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने कहा कि याचिका में मांगी गई मूल राहतों पर अब आगे विचार करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन संशोधित कानून को पूरी तरह प्रभावी बनाना जरूरी है।
बीड़ी बनाने के काम में बच्चों को लगाने की अनुमति को दी गई थी चुनौती
वर्ष 2009 में दाखिल याचिका में बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था।
इस प्रावधान के तहत पारिवारिक श्रम के रूप में कार्यशालाओं तथा सरकारी सहायता प्राप्त या वित्तपोषित स्कूलों में बच्चों को बीड़ी बनाने जैसे खतरनाक काम में लगाने की अनुमति थी।
याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को ऐसे बाल श्रमिकों के लिए शिक्षा की सुविधाएं और प्रतिदिन दो बार मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने का निर्देश देने की भी मांग की थी।
याचिकाकर्ता संगठन की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण और प्रणव सचदेवा पेश हुए।
केंद्र ने कहा, 2016 के संशोधन से शिकायतों का समाधान हुआ
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील ने पीठ को बताया कि मूल कानून में किए गए संशोधनों से याचिकाकर्ता की शिकायतों का काफी हद तक समाधान हो गया है। इसलिए याचिका पर आगे विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 को अधिनियम संख्या 35, 2016 के रूप में लागू किया गया था। यह कानून 1 सितंबर 2016 से प्रभावी हुआ।
संशोधन के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सभी व्यवसायों और प्रक्रियाओं में काम पर रखने पर व्यापक प्रतिबंध लगाया गया।
इन बदलावों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि याचिका में मांगी गई मूल राहतों पर अब विचार करने की आवश्यकता नहीं रह गई है।
हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि संशोधित कानून के प्रावधानों को पूरी तरह लागू करना आवश्यक है।
इसी के साथ कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को विशेष सेल गठित करने, कानून के क्रियान्वयन की निरंतर निगरानी करने और संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों के माध्यम से प्रवर्तन एजेंसियों को आवश्यक निर्देश जारी करने का आदेश दिया।
