बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) में वर्ष 2002 के संशोधन से पहले दायर मुकदमे में भी वादी को किसी भी समय वादपत्र में संशोधन करने का असीमित अधिकार नहीं है। कोर्ट ने 1995 से लंबित भूमि विवाद में सर्वे नंबर बदलने की अनुमति देने से इनकार करते हुए कहा कि इसे टाइपिंग की गलती नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संदीप वी. मार्ने की एकल पीठ ने सुभद्राबाई तुकाराम काटे की याचिका खारिज करते हुए 23 अप्रैल 2018 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इस आदेश में वादपत्र में संशोधन का आवेदन अस्वीकार किया गया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रस्तावित संशोधन न केवल समयसीमा के कारण बाधित था, बल्कि इससे भूमि खरीद चुके तीसरे पक्षों के अधिकार भी प्रभावित होते।
31 साल पुराने भूमि विवाद में संशोधन की मांग
विवाद पुणे के वडगांव मावल स्थित कार्ला गांव की कृषि भूमि से संबंधित है।
तुकाराम काटे की पत्नी और बहन ने वर्ष 1995 में नियमित सिविल वाद संख्या 85/1995 दाखिल किया था। इसमें गट नंबर 583 और 612 की जमीन पर स्वामित्व तथा कब्जे की घोषणा मांगी गई थी।
प्रतिवादी सिंधु भास्कर धोते ने दावा किया कि उन्होंने वर्ष 1972 में तुकाराम काटे से जमीन खरीदी थी। वैकल्पिक रूप से उन्होंने प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) का भी दावा किया।
फरवरी 2000 में अनुपस्थिति के कारण मुकदमा खारिज हो गया था, जिसे सितंबर 2009 में बहाल किया गया।
वर्ष 2013 में वादियों ने 26 दिसंबर 2008 के बिक्री विलेख को चुनौती देने के लिए वादपत्र संशोधित किया, लेकिन यह चुनौती केवल गट नंबर 583 तक सीमित रखी गई।
इसके बाद 27 नवंबर 2017 को वादी संख्या एक ने नया आवेदन दाखिल कर गट नंबर 612 के स्थान पर 602 दर्ज करने की अनुमति मांगी। उन्होंने इसे टाइपिंग की गलती बताया।
साथ ही दो नए प्रतिवादियों को पक्षकार बनाने और वर्ष 2006 से 2008 के बीच निष्पादित कई बिक्री विलेखों तथा दस्तावेजों को चुनौती देने की मांग की।
याचिकाकर्ता ने कहा, संशोधन केवल औपचारिक
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेल शाह के साथ अधिवक्ता किशोर पाटिल, अमोल म्हात्रे, अनीश किकले, अक्षदा नारगले और साक्षात रेलेकर पेश हुए।
उन्होंने तर्क दिया कि गट नंबर में सुधार केवल औपचारिक संशोधन है।
State Bank of Hyderabad v. Town Municipal Council फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि आदेश 6 नियम 17 CPC के तहत समुचित सावधानी (Due Diligence) की शर्त वर्ष 1995 में दाखिल मुकदमे पर लागू नहीं होती।
याचिकाकर्ता ने Shanti Devi v. Jagan Devi फैसले के आधार पर दलील दी कि परिसीमा अधिनियम का अनुच्छेद 59 लागू नहीं होगा। उनका यह भी कहना था कि देरी की भरपाई खर्च लगाकर की जा सकती है।
प्रतिवादी संख्या दो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल अंतुरकर के साथ अधिवक्ता संदीप फाटक और अधिक कदम पेश हुए।
उन्होंने कहा कि मूल वादपत्र में गट नंबर 612 की सीमाओं का स्पष्ट विवरण दिया गया था। वर्ष 2013 में भी वादियों ने जानबूझकर बिक्री विलेख को केवल गट नंबर 583 के संबंध में चुनौती दी, जबकि उसमें गट नंबर 602 भी शामिल था।
प्रतिवादी संख्या 5(a) से 5(j) की ओर से अधिवक्ता नीलेश वाबले उपस्थित हुए।
जमीन का नंबर दर्ज करना टाइपिंग की गलती नहीं था
हाईकोर्ट ने मूल वादपत्र में जमीन की सीमाओं की जांच की। उसमें पूर्व दिशा में गट नंबर 611 और पश्चिम दिशा में गट नंबर 613 दर्ज था।
बेंच ने पाया कि ये सीमाएं गट नंबर 612 से संबंधित थीं।
कोर्ट ने कहा:
“इस प्रकार, गट नंबर 612 का उल्लेख टाइपिंग की गलती नहीं लगता, बल्कि गट नंबर 612 की जमीन को मुकदमे में शामिल करने का सोच-समझकर लिया गया निर्णय प्रतीत होता है।”
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि याचिका में वर्ष 2000 में मुकदमा खारिज होने, 2009 में बहाल होने और 2013 में किए गए संशोधन की जानकारी नहीं दी गई थी।
इसके अतिरिक्त मुकदमे के साथ दाखिल दस्तावेजों और वर्ष 1994 में वादियों द्वारा कलेक्टर को दिए गए आवेदन में भी गट नंबर 612 का उल्लेख था।
जिन दो व्यक्तियों को नए प्रतिवादी के रूप में शामिल करने की मांग की गई थी, उन्हें हाईकोर्ट में दाखिल रिट याचिका में भी पक्षकार नहीं बनाया गया था।
तीसरे पक्ष के खरीदारों के अधिकार प्रभावित नहीं किए जा सकते
कोर्ट ने पाया कि मुकदमा लंबित रहने के दौरान कई व्यक्तियों ने गट नंबर 602 की जमीन के हिस्से खरीदे थे।
बेंच ने कहा:
“वादी संख्या एक को अब इतने लंबे समय के बाद गट नंबर 602 को मुकदमे में शामिल करके विभिन्न तीसरे पक्षों के अधिकारों को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि वादी संख्या एक ने तीसरे पक्षों द्वारा जमीन के हिस्से खरीद लिए जाने के बाद ही गट नंबर 602 को मुकदमे में शामिल करने का प्रयास किया।
बिक्री विलेखों को चुनौती देने की समयसीमा समाप्त
परिसीमा के प्रश्न पर हाईकोर्ट ने Shanti Devi v. Jagan Devi फैसले को वर्तमान विवाद से अलग बताया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह फैसला ऐसी स्थिति से संबंधित था, जहां संयुक्त मालिक दूसरे संयुक्त मालिक द्वारा किए गए हस्तांतरण को अपने हिस्से पर बाध्यकारी न होने की घोषणा चाहता है।
वर्तमान मामले में वादी पूरी जमीन पर स्वामित्व का दावा कर रहे थे और उनका स्वामित्व स्वीकार किया हुआ नहीं था।
Life Insurance Corporation of India v. Sanjeev Builders Private Limited फैसले का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने माना कि वर्ष 2006 से 2008 के बिक्री विलेखों को चुनौती देने की मांग परिसीमा अवधि समाप्त होने के कारण स्वीकार नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि ये मांगें “परिसीमा अवधि से पूरी तरह बाधित हैं।”
देरी की भरपाई खर्च लगाकर करने की दलील भी खारिज करते हुए बेंच ने कहा:
“जब संशोधन पूरी तरह परिसीमा अवधि से बाधित हो और सद्भावनापूर्ण न हो, तो खर्च लगाकर उसे स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता।”
2002 से पहले के मुकदमों में भी संशोधन का असीमित अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमा 31 वर्षों से लंबित है और केवल इस आधार पर संशोधन की अनुमति नहीं दी जा सकती कि इसे CPC के वर्ष 2002 के संशोधन से पहले दाखिल किया गया था।
बेंच ने स्पष्ट किया:
“हालांकि आदेश 6 नियम 17 का परंतुक CPC (संशोधन) अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया था, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वर्ष 2002 से पहले दायर मुकदमे में वादी किसी भी समय वादपत्र में संशोधन कर सकता है।”
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रस्तावित संशोधन सद्भावनापूर्ण नहीं था और ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
इसी के साथ रिट याचिका बिना खर्च संबंधी आदेश के खारिज कर दी गई।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Smt. Subhadrabai Tukaram Kate v. Mrs. Sindhu Bhaskar Dhote and others
केस नंबर: Writ Petition No. 11242 of 2018 with Interim Application No. 3631 of 2026
पीठ: जस्टिस संदीप वी. मार्ने
फैसले की तारीख: 28 अक्टूबर 2026
