बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई में पांच वर्षीय बच्चे के अपहरण और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी पूरी श्रृंखला साबित नहीं कर सका, जिससे अपराध में आरोपी की संलिप्तता निर्विवाद रूप से स्थापित हो।
जस्टिस मनीष पिताले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की डिवीजन बेंच ने मनीषप्रसाद नरसिंह गौड़ की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 363 और 201 के तहत उसकी दोषसिद्धि रद्द कर दी।
कोर्ट ने आरोपी को किसी अन्य मामले में हिरासत आवश्यक न होने पर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
2012 में लापता हुआ था पांच साल का बच्चा
अभियोजन के अनुसार, मुंबई के कांदिवली इलाके में 26 अगस्त 2012 को पांच वर्षीय बच्चा खेलने के लिए घर से निकला और लापता हो गया।
इसके बाद बच्चे के पिता को एक व्यक्ति ने फोन किया, जिसने अपना नाम ‘राजा’ बताया। फोन करने वाले ने बच्चे को अपने कब्जे में होने का दावा करते हुए 50,000 रुपये की फिरौती मांगी।
पुलिस ने 30 अगस्त 2012 को मनीषप्रसाद गौड़ को गिरफ्तार किया। अभियोजन का दावा था कि 31 अगस्त को आरोपी के खुलासे के आधार पर बच्चे का शव बरामद हुआ।
5 मई 2018 को डिंडोशी स्थित ग्रेटर बॉम्बे की सेशंस कोर्ट ने गौड़ को हत्या के लिए उम्रकैद, अपहरण के लिए पांच साल और साक्ष्य मिटाने के लिए दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
ट्रायल कोर्ट ने सभी सजाएं एक के बाद एक भुगतने का आदेश दिया था।
बचाव पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर उठाए सवाल
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत पांडेय के साथ अधिवक्ता रिद्धिमा मंगांवकर, नेहा बलानी और दिनेश जाधवानी पेश हुए।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन अभियोजन उनकी पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं कर पाया।
उन्होंने कहा कि शव मिलने का स्थान पुलिस को पहले से मालूम था, अंतिम बार बच्चे को आरोपी के साथ देखने वाले गवाह भरोसेमंद नहीं थे और आवाज की जांच रिपोर्ट नकारात्मक थी।
बचाव पक्ष ने पंच गवाहों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वे नियमित रूप से पुलिस के लिए पंच बनते थे।
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक डॉ. धनलक्ष्मी एस. कृष्णैय्यर ने कहा कि अभियोजन ने चारों परिस्थितियां ठोस साक्ष्यों से साबित की थीं।
उन्होंने दलील दी कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत शव की बरामदगी वैध थी और गवाह का बयान दर्ज करने में देरी से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।
15 दिन तक चुप रहे गवाह की गवाही पर भरोसा नहीं
हाईकोर्ट ने अंतिम बार बच्चे को आरोपी के साथ देखे जाने संबंधी साक्ष्यों की जांच की।
बेंच ने पाया कि अभियोजन गवाह PW-5 का बयान घटना के 15 दिन बाद दर्ज हुआ था। उसने इससे पहले पुलिस, अपने भाई या बच्चे के पिता को यह नहीं बताया था कि उसने बच्चे को आरोपी के साथ देखा था।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“PW-5 एक तैयार किया गया गवाह प्रतीत होता है।”
दूसरे गवाह PW-6 के संबंध में कोर्ट ने पाया कि वह स्वयं संदेह के घेरे में था और उसे आरोपी का नाम पुलिस से पता चला था।
उसके बयान की पुष्टि के लिए कोई कॉल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया। अभियोजन ने उन तीन व्यक्तियों की भी गवाही नहीं कराई, जो उसके कथन की पुष्टि कर सकते थे।
बेंच ने कहा:
“इस गवाह की बिना पुष्टि वाली गवाही पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण होगा।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना और शव मिलने के बीच पांच दिन का अंतर था। ऐसे में किसी तीसरे व्यक्ति की संलिप्तता की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
13 मामलों में पंच बन चुका था शव बरामदगी का गवाह
शव की बरामदगी से जुड़े साक्ष्यों पर हाईकोर्ट ने पाया कि पंच गवाह कांदिवली पुलिस स्टेशन के 13 मामलों में पंच की भूमिका निभा चुका था।
उसे अदालत में गवाही देने से पहले पंचनामे की प्रति भी उपलब्ध कराई गई थी।
कोर्ट ने उसे “पुलिस का नियमित पंच गवाह” बताया।
इसके अतिरिक्त जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि शिकायतकर्ता ने शव मिलने वाले स्थान की जानकारी पहले ही दे दी थी।
जांच अधिकारी के अनुसार, 31 अगस्त 2012 को शाम चार बजे तक आरोपी ने उस स्थान का खुलासा नहीं किया था।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने अभियोजन के शव बरामदगी संबंधी दावे को विश्वसनीय नहीं माना।
फिरौती की कॉल को आरोपी से जोड़ने वाले इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं
हाईकोर्ट ने फिरौती की कथित कॉल से संबंधित साक्ष्यों में भी कमियां पाईं।
कोर्ट ने ध्यान दिया कि बच्चे के पिता ने उसी शाम एफआईआर दर्ज कराते समय फिरौती की कॉल का उल्लेख नहीं किया था।
आवाज की जांच करने वाले विशेषज्ञ की रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई।
इसके अलावा, कथित कॉल से मोबाइल फोन और सिम कार्ड को जोड़ने के लिए कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) तथा धारा 65B के प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किए गए।
बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए धारा 65B के प्रमाणपत्र की आवश्यकता पर सुप्रीम कोर्ट के Pooranmal v. State of Rajasthan फैसले का उल्लेख किया।
हत्या साबित हुई, लेकिन आरोपी से संबंध स्थापित नहीं
हाईकोर्ट ने माना कि बच्चे की मृत्यु हत्या के कारण हुई थी। हालांकि, रासायनिक विश्लेषक की रिपोर्ट से कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं निकलता था।
बेंच ने कहा:
“इस प्रकार हमारा निष्कर्ष है कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की ऐसी श्रृंखला साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है, जो बिना किसी संदेह के आरोपी के अपराधी होने की ओर संकेत करती हो।”
अपहरण के आरोप पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Anversinh @ Kiransinh Fatesinh Zala v. State of Gujarat फैसले का उल्लेख किया।
बेंच ने कहा:
“संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”
उम्रकैद और निश्चित अवधि की सजा लगातार चलाने का आदेश भी गलत
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सजा संबंधी निर्देश में भी कानूनी त्रुटि पाई।
O.M. Cherian v. State of Kerala और Gopi @ Sahaya Puruna v. The State के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने कहा:
“ट्रायल कोर्ट उम्रकैद की सजा को निश्चित अवधि की सजा के बाद लगातार चलाने का निर्देश नहीं दे सकता था।”
दोषसिद्धि रद्द, तत्काल रिहाई का आदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने मनीषप्रसाद नरसिंह गौड़ की अपील स्वीकार करते हुए हत्या, अपहरण और साक्ष्य मिटाने के सभी आरोपों से उसे बरी कर दिया।
कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत आवश्यक नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
हालांकि, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 481 के तहत उसे 50,000 रुपये का व्यक्तिगत मुचलका भरना होगा।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Manishprasad Narsingh Gaud v. The State of Maharashtra
केस नंबर: Criminal Appeal No. 294 of 2020
पीठ: जस्टिस मनीष पिताले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट
फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026
