इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 1997 में सेवानिवृत्त हुए एक उपजिलाधिकारी (SDM) को पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में हुई देरी पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने पाया कि अधिकारी ने रिटायरमेंट से काफी पहले सभी जरूरी दस्तावेज जमा कर दिए थे और भुगतान में देरी के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर ब्याज का भुगतान करने का निर्देश देते हुए कहा कि पहले से जमा दस्तावेज दोबारा मांगना उचित नहीं था।
1997 में रिटायर हुए SDM को वर्षों बाद मिला भुगतान
याचिकाकर्ता आद्या प्रसाद मिश्र 31 जुलाई 1997 को बलरामपुर जिले के उतरौला में उपजिलाधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
उनके अनुसार, उन्होंने रिटायरमेंट से लगभग डेढ़ साल पहले ही फॉर्म 425-A सहित सभी आवश्यक दस्तावेज गोंडा के जिलाधिकारी कार्यालय में जमा कर दिए थे।
25 मई 1997 को उनका तबादला नवगठित बलरामपुर जिले में हो गया। इसके बाद दस्तावेज जमा किए जाने को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ और सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में देरी हुई।
पेंशन का बकाया, ग्रेच्युटी और पेंशन के कम्यूटेशन की रकम 27 मार्च 1999 को मिली, यानी रिटायरमेंट के लगभग 20 महीने बाद।
अवकाश नकदीकरण, पूरक देय राशि, संशोधित वेतन का बकाया और समूह बीमा का भुगतान वर्ष 2000 से 2001 के बीच किया गया।
सामान्य भविष्य निधि (GPF) की 90 प्रतिशत राशि, यानी 93,000 रुपये, 26 जून 2002 को दी गई। शेष 10 प्रतिशत राशि, 24,436 रुपये, का भुगतान 29 मार्च 2004 को हुआ। इस पर ब्याज की गणना केवल अगस्त 1998 तक की गई थी।
20 साल बाद दोबारा सरकार के पास भेजने का आदेश हुआ था रद्द
आद्या प्रसाद मिश्र ने विलंबित भुगतान पर ब्याज की मांग करते हुए वर्ष 2003 में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
20 फरवरी 2023 को उनकी याचिका का निपटारा करते हुए राज्य सरकार के समक्ष प्रत्यावेदन देने की छूट दी गई।
हालांकि, 24 अप्रैल 2023 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने यह आदेश रद्द कर याचिका बहाल कर दी।
डिवीजन बेंच ने कहा कि लगभग 20 साल की मुकदमेबाजी के बाद याचिकाकर्ता को दोबारा राज्य सरकार के पास भेजना उचित नहीं है। उस समय उनकी उम्र लगभग 84 वर्ष थी। इसलिए मामले का जल्द निर्णय करने को कहा गया।
दस्तावेज समय पर जमा होने के बावजूद भुगतान रोका गया
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रजत राजन सिंह ने दलील दी कि सभी दस्तावेज निर्धारित समय पर जमा किए जा चुके थे और देरी पूरी तरह सरकारी अधिकारियों की ओर से हुई।
राज्य सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता रितेश कुमार सिंह पेश हुए।
सरकारी पक्ष ने बाद के पत्राचार के आधार पर यह दिखाने का प्रयास किया कि याचिकाकर्ता ने फॉर्म 425-A और अन्य दस्तावेज समय पर जमा नहीं किए थे।
लेकिन हाईकोर्ट ने 21 जुलाई 1997 को गोंडा के जिलाधिकारी द्वारा सहायक लेखाधिकारी, राजस्व परिषद, फैजाबाद मंडल को भेजे गए पत्र को महत्वपूर्ण माना।
इस पत्र में स्वीकार किया गया था कि फॉर्म 425-A सहित सभी आवश्यक दस्तावेज पेंशन संबंधी लाभ जारी करने के लिए पहले ही भेजे जा चुके थे।
पहले से जमा दस्तावेज दोबारा मांगना केवल दिखावा: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने पाया कि गोंडा के जिलाधिकारी के पत्र के बावजूद बलरामपुर के अपर जिलाधिकारी द्वारा उन्हीं दस्तावेजों की दोबारा मांग करने का कोई आधार नहीं था।
कोर्ट ने कहा:
“याचिकाकर्ता द्वारा सेवानिवृत्ति की आयु पूरी होने से काफी पहले जमा किए जा चुके उन्हीं दस्तावेजों की दोबारा मांग करना, इस रिट याचिका के दाखिल होने के बाद कमी को छिपाने के लिए किया गया महज दिखावा था।”
बेंच ने आगे कहा:
“किसी भी दृष्टिकोण से यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता की ओर से दस्तावेज जमा करने में देरी हुई थी।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया:
“सभी सेवानिवृत्ति देयों का भुगतान सेवानिवृत्ति की तारीख से तीन महीने के भीतर किया जाना आवश्यक है।”
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि भुगतान में देरी के लिए सरकारी अधिकारी जिम्मेदार थे और याचिकाकर्ता विलंबित रकम पर ब्याज पाने का हकदार है।
आठ सप्ताह में 12 प्रतिशत ब्याज देने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिवादी संख्या तीन को पेंशन, ग्रेच्युटी, GPF और अन्य सेवानिवृत्ति देयों के विलंबित भुगतान पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया।
ब्याज की गणना सेवानिवृत्ति की तारीख से संबंधित रकम के वास्तविक भुगतान तक की जाएगी।
कोर्ट ने आदेश दिया कि ब्याज की पूरी रकम आठ सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को दी जाए।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Adya Prasad Misra v. State of U.P. Through Secy. Revenue and 8 Ors.
केस नंबर: Writ-A No. 2000061 of 2003
पीठ: जस्टिस अनीश कुमार गुप्ता
फैसले की तारीख: 27 अक्टूबर 2026
