केरल हाईकोर्ट ने राज्य में ताड़ी की दुकानों पर महिलाओं के काम करने पर रोक लगाने वाले नियम को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत महिलाओं को मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
जस्टिस पी. गोपीनाथ ने केरल आबकारी दुकान निस्तारण नियम, 2002 के नियम 7(37) को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि महिलाओं को किसी व्यवसाय में काम करने से पूरी तरह रोकना संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप नहीं है। इस नियम के तहत ताड़ी की दुकानों में किसी भी पद या भूमिका में महिलाओं की नियुक्ति प्रतिबंधित थी।
अगस्त में सुनाया गया यह फैसला सोफी नामक महिला की याचिका पर आया। पति की मृत्यु के बाद सोफी ने त्रिशूर जिले की एक ताड़ी की दुकान में औद्योगिक समझौता योजना के तहत अनुकंपा नियुक्ति मांगी थी। उनका आवेदन खारिज होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर रोजगार से वंचित नहीं कर सकते
हाईकोर्ट ने कहा कि महिलाओं को कार्यस्थल पर उत्पीड़न से बचाना और उनके लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। हालांकि, इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए महिलाओं को उनकी पसंद के व्यवसाय में काम करने से रोकना उचित नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार को महिलाओं के रोजगार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसी परिस्थितियां विकसित करनी चाहिए, जिनमें वे बिना किसी भय के अपनी पसंद का पेशा चुन सकें।
कोर्ट के अनुसार, राज्य को लैंगिक अंतर के कारण उत्पन्न असमान परिस्थितियों को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही ऐसे सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करने चाहिए, जिनसे महिलाओं में अपनी पसंद के किसी भी क्षेत्र में काम करने का विश्वास पैदा हो।
संविधान के चार अनुच्छेदों का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने पाया कि केरल आबकारी दुकान निस्तारण नियम, 2002 का नियम 7(37) महिलाओं को ताड़ी की दुकानों में किसी भी हैसियत से काम करने से पूरी तरह प्रतिबंधित करता था।
जस्टिस गोपीनाथ ने इस प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के विपरीत माना।
हाईकोर्ट ने सोफी की याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित नियम को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया। इसके साथ ही वर्ष 2002 के नियमों के तहत ताड़ी की दुकानों में महिलाओं की नियुक्ति पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो गया।
