जजों के भत्तों पर टैक्स विवाद: दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों के टैक्स रिटर्न प्रोसेसिंग रोकने का दिया निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को अपना परमानेंट अकाउंट नंबर (PAN) आयकर विभाग को सौंपने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने मामले का अंतिम निस्तारण होने तक इन PAN खातों से जुड़े किसी भी टैक्स रिफंड या टैक्स डिमांड की प्रोसेसिंग पर रोक लगा दी है।

जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने यह आदेश आयकर विभाग द्वारा दर्ज कराई गई व्यावहारिक दिक्कतों के बाद दिया। आयकर विभाग ने 5 अगस्त को अदालत में आवेदन दाखिल कर बताया था कि उसकी स्वचालित राष्ट्रीय प्रणाली कुछ ही मिनटों में रिटर्न प्रोसेस कर देती है। ऐसे में देश भर के करोड़ों करदाताओं की प्रोसेसिंग रोके बिना केवल जजों के रिटर्न अलग से रोकना संभव नहीं था। इस समस्या के समाधान के लिए कोर्ट ने नई कर व्यवस्था के तहत रिटर्न दाखिल करने वाले जजों के निजी सचिवों को 18 अगस्त तक नामित कर अधिकारी को PAN विवरण देने का निर्देश दिया है।

केंद्रीय कर ज्ञापन को दी गई चुनौती

यह पूरा मामला दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन (DTBA) द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। करीब 800 कर विशेषज्ञों के इस संगठन ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के सितंबर 2025 के उस ज्ञापन को चुनौती दी है, जिसके तहत नई कर व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को मिलने वाले भत्तों और सुविधाओं को कर के दायरे में ला दिया गया है। एसोसिएशन का कहना है कि उसके सदस्य न केवल जजों का रिटर्न दाखिल करते हैं बल्कि उन्हें निवेश और कर संबंधी सलाह भी देते हैं।

पारंपरिक कर व्यवस्था में ‘हाईकोर्ट जज अधिनियम 1954’ और ‘सुप्रीम कोर्ट जज अधिनियम 1958’ के तहत जजों को मिलने वाले सरकारी आवास, वाहन भत्ता, आतिथ्य (सम्चुअरी) भत्ता और अवकाश यात्रा रियायत (LTC) जैसे लाभ कर-मुक्त थे। हालांकि, आयकर अधिनियम की धारा 115BAC के तहत शुरू की गई नई कर व्यवस्था में कम कर दरों के बदले अधिकांश छूट समाप्त कर दी गई हैं।

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न्यायिक स्वतंत्रता और वैधानिक अधिकार

याचिकाकर्ता एसोसिएशन का तर्क है कि कार्यकारी ज्ञापन के जरिए संसद द्वारा दिए गए वैधानिक अधिकारों या सेवा शर्तों को नहीं छीना जा सकता और न ही जजों की कर देनदारी बढ़ाई जा सकती है। एसोसिएशन के अनुसार, प्रशासनिक आदेशों से संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा मानी जाने वाली न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, कर अधिकारियों का कहना है कि नई कर व्यवस्था में पहले से ही कम टैक्स रेट और ज्यादा छूट की सीमा दी गई है। धारा 115BAC के तहत अन्य कानूनों में मिलने वाली छूटों को रोकना अनिवार्य है ताकि एक ही लाभ दो बार न लिया जा सके।

पिछला अंतरिम आदेश और समानांतर याचिकाएं

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इससे पहले 22 जुलाई को दिए अपने अंतरिम आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने जजों को छूट वाले भत्तों को ‘आय श्रेणी में न आने वाली प्राप्तियां’ के रूप में दर्ज करने की अनुमति दी थी और विभाग को इनकी प्रोसेसिंग न करने का निर्देश दिया था।

इसी तरह का मुद्दा इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी उठा था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप जैन ने जुलाई में याचिका दाखिल कर बताया था कि वर्ष 2025-26 के लिए उनके 46.78 लाख रुपये के कुल वेतन में से 9.85 लाख रुपये भत्तों के थे (जिसमें 2.81 लाख रुपये सम्चुअरी भत्ता और 7.04 लाख रुपये मकान किराया भत्ता शामिल हैं)। नई व्यवस्था में यह पूरा भत्ता कर योग्य हो जाता। इस पर 28 जुलाई को जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की पीठ ने अलग से अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए कहा था कि दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश पहले से ही लागू है।

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इस पूरे मामले पर वित्त मंत्रालय और CBDT की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

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