सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अदालतों को जमानत याचिकाओं या आपराधिक मुकदमों पर सुनवाई करते समय व्यक्तिगत नैतिकता या अपनी निजी धारणाओं को थोपने से बचना चाहिए। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए, जिसमें सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार की “नैतिकता” का हवाला देकर जमानत खारिज कर दी गई थी, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने एक साल से अधिक समय से हिरासत में बंद आरोपी को नियमित जमानत दे दी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के स्टेशन रोड थाने में दर्ज अपराध संख्या 548/2025 से जुड़ा है। इस मामले में अपीलकर्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 137(2), 65(2), 64(2)(m) और 87; लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो एक्ट) की धारा 3(A), 4(2) और 5(m)/6; तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(w)(II) और 3(2)(v) के तहत केस दर्ज किया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ता पीड़िता के पड़ोस में किराएदार के तौर पर रहता था। विवाहित होने के बावजूद उसने कथित रूप से पीड़िता की बड़ी बहन का अपहरण करने की कोशिश की, जिसके चलते पहले अपराध संख्या 259/2025 दर्ज हुआ था। इसके बाद नाबालिग पीड़िता ने अपनी मां को बताया कि अपीलकर्ता ने करीब एक महीने तक उसका यौन शोषण किया, जिसके आधार पर मौजूदा केस दर्ज हुआ। अपीलकर्ता 10 सितंबर 2025 से जेल में बंद था। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ द्वारा 20 मार्च 2026 को नियमित जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि यह पूरा मामला पीड़िता की बड़ी बहन के साथ उसके संबंधों की वजह से पैदा हुआ विवाद है और उसे केवल परेशान करने व सबक सिखाने के इरादे से झूठा फंसाया गया है। वकील ने इस बात पर जोर दिया कि अपीलकर्ता एक वर्ष से अधिक समय से जेल में है। पूर्व मामले (अपराध संख्या 259/2025) में 1 जुलाई 2026 को हुई सजा का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उस आदेश के खिलाफ अपील दाखिल की जा चुकी है और उसमें सफलता मिलने की पूरी संभावना है।
दूसरी ओर, मध्य प्रदेश सरकार के वकील ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता को पहले ही एक मामले में दोषी ठहराया जा चुका है और मौजूदा मामला नाबालिग लड़की के यौन शोषण से जुड़ा बेहद गंभीर अपराध है। राज्य सरकार ने यह भी तर्क रखा कि मुकदमे का ट्रायल चल रहा है और प्रस्तावित 15 गवाहों में से 5 की गवाही हो चुकी है, लिहाजा इस मोड़ पर जमानत पर रिहा करना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी
हाईकोर्ट के आदेश की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने जमानत देने से इसलिए इनकार किया था क्योंकि आरोपी की रिहाई से सामाजिक व्यवस्था और पीड़िता के परिवार की “नैतिकता” पर असर पड़ सकता था।
हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को अनुचित बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हमारा मानना है कि अदालतों को जमानत से जुड़े मामले या किसी आरोपी के आपराधिक मुकदमे की सुनवाई करते समय नैतिकता या अन्य किसी पहलू पर पीठासीन जज के व्यक्तिगत विचारों या मूल्य निर्णयों को थोपने से बचना चाहिए।”
मामले के तथ्यों को देखते हुए पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता पहले ही एक साल से ज्यादा की जेल काट चुका है और ट्रायल पूरा होने में अभी और समय लगेगा। इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि जमानत के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं।
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 20 मार्च 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को 7 दिनों के भीतर संबंधित विशेष अदालत के समक्ष पेश किया जाए, जहां से उसे उचित नियमों और शर्तों पर जमानत पर रिहा किया जाएगा।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह जमानत आदेश उस आपराधिक अपील में आरोपी की हिरासत के अधीन रहेगा, जिसमें उसने पूर्व मामले में मिली सजा को चुनौती दी है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कान्हा उर्फ कन्हैया सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 9810/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर 2026

