इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को 13 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात संबंधी न्यायिक आदेश का उल्लंघन कर उसका सिजेरियन ऑपरेशन (सी-सेक्शन) करने के मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की दो सदस्यीय खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि संबंधित डॉक्टर अदालत के स्पष्ट निर्देश की अनदेखी के चलते प्रथम दृष्टया “जानबूझकर की गई लापरवाही” के दोषी प्रतीत होते हैं।
पीठ ने तल्ख रुख अपनाते हुए कहा कि यह उन डॉक्टरों के खिलाफ समुचित कानूनी कार्रवाई का उपयुक्त मामला है, जिन्होंने एक दुष्कर्म पीड़िता की जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया, जिसने अदालत से केवल गर्भ समाप्त कराने की गुहार लगाई थी।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव (चिकित्सा एवं स्वास्थ्य) को निर्देश दिया कि वे इस पूरे घटनाक्रम की जांच कर दो सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपें। इस जांच के तहत ऑपरेशन में शामिल डॉक्टरों, नाबालिग पीड़िता, उसकी मां और मामले के जांच अधिकारी (विवेचक) के बयान दर्ज किए जाएंगे।
अस्पताल में सर्जरी और नवजात का जन्म
यह प्रकरण तब शुरू हुआ जब कानूनी रूप से निर्धारित 24 सप्ताह की समय-सीमा बीत जाने के बाद पीड़िता ने गर्भपात की अनुमति के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। मेडिकल बोर्ड की जांच रिपोर्ट में गर्भ की अवधि लगभग 29 सप्ताह और दो दिन आंकी गई थी। नाबालिग ने अपनी याचिका में कहा था कि गर्भावस्था को आगे जारी रखने से उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा आघात पहुंचेगा।
पीड़िता की अल्पायु, उसके साथ हुए अपराध, उसके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य तथा परिजनों की सहमति को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने 21 सितंबर को प्रयागराज स्थित एसआरएन अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) को गर्भपात कराने का निर्देश दिया था।
अस्पताल की ओर से बाद में अदालत को बताया गया कि 22 सितंबर की शाम को योनि मार्ग (वेजाइनल इंडक्शन) के जरिए गर्भपात की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन यह प्रयास विफल रहा। इसके बाद डॉक्टरों ने सी-सेक्शन करने का फैसला किया। इस ऑपरेशन के बाद एक जीवित बच्चे का जन्म हुआ, जिसे विशेष देखभाल के लिए चिल्ड्रन्स अस्पताल में भर्ती कराया गया।
अदालत में विभागाध्यक्ष की गैरहाजिरी और डॉक्टरों से तीखे सवाल
गर्भपात आदेश का अनुपालन न होने की सूचना पर हाईकोर्ट ने 23 सितंबर को संबंधित डॉक्टरों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब किया। दोपहर 2 बजे सुनवाई के दौरान जब कोर्ट को बताया गया कि मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. अमृता चौरसिया बिना कोई स्पष्टीकरण दिए शहर से बाहर चली गई हैं, तो पीठ ने इस पर गहरा आश्चर्य और असंतोष जताया।
विभागाध्यक्ष की अनुपस्थिति में विभाग की कार्यवाहक प्रमुख डॉ. वंदना ओझा और ऑपरेशन करने वाली मेडिकल कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. ऐमन अब्बासी अदालत में पेश हुईं। सुनवाई के दौरान जब खंडपीठ ने पूछा कि गर्भपात के अदालती आदेश के विपरीत सिजेरियन सर्जरी करने का फैसला किसका था और यह निर्देश किसने दिया था, तो सर्जरी करने वाली डॉ. ऐमन अब्बासी इसका कोई जवाब नहीं दे सकीं।
जांच के दायरे में पूरी प्रक्रिया, अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को
अदालत ने कहा कि पूरे घटनाक्रम की पड़ताल जरूरी है ताकि यह साफ हो सके कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यह लापरवाही किसके स्तर पर हुई। प्रमुख सचिव को सभी पक्षों की पड़ताल कर तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर तय की है।

