ओबीसी क्रीमी लेयर फैसले को लागू करने के लिए केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मांगा दो साल का समय, पुरानी नियुक्तियों में उथल-पुथल की जताई आशंका

केंद्र सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के क्रीमी लेयर निर्धारण से जुड़े हालिया फैसले को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से कम से कम दो साल का समय मांगा है। सरकार ने दलील दी है कि केवल माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमी लेयर तय न करने के इस फैसले को अगर पिछली तारीख से लागू किया गया, तो देशभर में सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में हुए दाखिलों पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की इस विविध अर्जी (मिसलेनियस एप्लिकेशन) पर सुनवाई पूरी कर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। सरकार ने अदालत से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए 11 मार्च 2026 के इस फैसले को केवल ‘भविष्यलक्षी प्रभाव’ (प्रॉस्पेक्टिव इफेक्ट) से लागू करने का अनुरोध किया है, ताकि चल रही और पहले से पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाएं सुरक्षित रह सकें।

प्रशासनिक अव्यवस्था और पुरानी भर्तियों पर संभावित असर

केंद्र सरकार ने अदालत में दाखिल अर्जी में कहा कि यदि इस फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो इससे भारी प्रशासनिक अराजकता फैल जाएगी। इसका सीधा और अनुचित असर उन कर्मचारियों व अधिकारियों पर पड़ेगा जो इस मुकदमे में पक्षकार भी नहीं थे। इससे नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण पत्रों, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और पदोन्नति को लेकर गंभीर अनिश्चितता पैदा हो जाएगी।

सरकार के अनुसार, फैसले को भूतलक्षी प्रभाव से लागू करने पर साल 2012 से आयोजित सिविल सेवा परीक्षाओं के सफल उम्मीदवारों के सेवा आवंटन पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। इसके अलावा, वर्तमान में कार्यरत आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के काडर आवंटन में भी बदलाव की नौबत आ सकती है। केंद्र ने यह भी रेखांकित किया कि केंद्रीय और राज्यों के शैक्षणिक व व्यावसायिक संस्थानों में हुए प्रवेश भी बड़े पैमाने पर प्रभावित होंगे, जिससे ओबीसी अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हो सकता है और देश की समग्र आरक्षण व्यवस्था पर विपरीत असर पड़ेगा।

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पदों के समकक्ष निर्धारण और राष्ट्रीय नीति के लिए समय की मांग

दो साल या उससे अधिक की मोहलत मांगने के पीछे सरकार ने जमीनी प्रशासनिक तैयारियों का हवाला दिया है। केंद्र का कहना है कि फैसले को अमलीजामा पहनाने से पहले सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है, ताकि विभिन्न क्षेत्रों के बीच पदों की समकक्षता (इक्विवैलेंस ऑफ पोस्ट्स) तय की जा सके।

सरकार ने स्पष्ट किया कि इस समयावधि का उपयोग उन सभी श्रेणियों और क्षेत्रों में एक समान राष्ट्रीय नीति तैयार करने के लिए किया जाएगा, जहां अभी तक विभिन्न पदों की समकक्षता का औपचारिक पैमाना तय नहीं हो पाया है।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल माता-पिता की आय को ही ओबीसी अभ्यर्थियों के क्रीमी लेयर निर्धारण का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि आरक्षण के लाभ के मामले में सरकारी कर्मचारियों की तुलना में निजी क्षेत्र और सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) के समकक्ष कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग व्यवहार करना शत्रुतापूर्ण भेदभाव (होस्टाइल डिस्क्रिमिनेशन) के समान है।

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