पत्नी अगर पति को “काला” या “मोटा” कहती है, तो केवल इसी आधार पर वैवाहिक क्रूरता साबित मानकर तलाक नहीं दिया जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति की तलाक की अपील खारिज करते हुए कहा कि आरोप चाहे कितने भी हों, जब तक उन्हें ठोस और स्पष्ट सबूत से साबित नहीं किया जाता, वे तलाक की डिक्री का आधार नहीं बन सकते।
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने पाया कि पति न तो पत्नी की ओर से क्रूरता साबित कर सका और न ही यह दिखा सका कि पत्नी ने बिना उचित कारण उसे छोड़ दिया था।
पति का आरोप: पत्नी कहती थी ‘काला’ और ‘मोटा’
मामले में पति ने कई आरोप लगाए थे। इनमें एक आरोप यह भी था कि पत्नी उसे “black complexioned” और “fatty shaped” कहती थी।
हाईकोर्ट ने इस दलील पर सीधे कहा कि ऐसी बातों को अपने आप में तलाक देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“बेशक पति ने आरोप लगाया है कि पत्नी उसे काला या मोटा कहती थी, लेकिन इसे तलाक देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।”
यानी कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ अपमानजनक संबोधन का आरोप लगा देना काफी नहीं है। यह भी साबित करना होगा कि पत्नी का आचरण कानूनी रूप से वैवाहिक क्रूरता की सीमा तक पहुंचता था।
शादी के कुछ महीनों बाद ही रिश्ते में विवाद
दोनों की शादी 7 मार्च 2019 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। पति के अनुसार, शादी के बाद पत्नी करीब दो से तीन महीने उसके और परिवार के साथ रही।
पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उससे खराब व्यवहार करती थी, झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देती थी और बार-बार मायके चली जाती थी। उसने यह भी कहा कि पत्नी बिना उसकी सहमति राजस्थान में एक रिश्तेदार की शादी में गई थी और बाद में उसका गर्भपात हो गया।
पति का कहना था कि इसके बाद पत्नी की मां उसे रायगढ़ ले गईं और उसके प्रयासों के बावजूद पत्नी वापस ससुराल नहीं लौटी। उसने नवंबर 2019 में काउंसलिंग सेंटर का भी रुख किया और बाद में समाज के कुछ लोगों के साथ पत्नी को लेने गया, लेकिन उसके अनुसार पत्नी वापस आने के लिए तैयार नहीं हुई।
पत्नी ने कहा: पति ही वापस लेने नहीं आया
पत्नी ने पति के आरोपों से इनकार किया।
उसने आरोप लगाया कि पति का दूसरी महिला से संबंध था और जब उसे इसकी जानकारी हुई तो पति ने शराब पीना और उसके साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया। पत्नी ने यह भी कहा कि गर्भावस्था के दौरान उसकी ठीक से देखभाल नहीं की गई।
उसका कहना था कि तबीयत खराब होने पर उसकी मां उसे इलाज के लिए रायगढ़ ले गईं। ठीक होने के बाद उसने और उसकी मां ने कई बार पति और उसके परिवार से उसे वापस ले जाने को कहा, लेकिन वे नहीं आए।
पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ Domestic Violence Act के तहत कार्यवाही भी शुरू की थी।
फैमिली कोर्ट ने नहीं माने क्रूरता और परित्याग के आरोप
फैमिली कोर्ट, जांजगीर ने पति की हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी। कोर्ट ने cruelty और desertion दोनों आरोप साबित नहीं माने।
साथ ही, पत्नी की धारा 27 के तहत अर्जी स्वीकार करते हुए पति को उसके माता-पिता द्वारा दिए गए गिफ्ट और स्त्रीधन लौटाने का निर्देश दिया गया था।
इसके खिलाफ पति हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट बोला: आरोप बहुत हैं, लेकिन सबूत कहां हैं?
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि पति ने पत्नी के खिलाफ कई आरोप जरूर लगाए, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए ठोस और निर्णायक सबूत पेश नहीं किए।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“आरोप संख्या में भले ही कई हों, लेकिन जब उन्हें साबित करने के लिए कोई निश्चित सबूत न हो, तो वे पति के पक्ष में तलाक की डिक्री का आधार नहीं बन सकते।”
बेंच ने Supreme Court के Samar Ghosh v. Jaya Ghosh फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें mental cruelty से जुड़े सिद्धांतों पर चर्चा की गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई तथ्य या सबूत नहीं है जिससे पत्नी के व्यवहार को उस स्तर की क्रूरता माना जा सके जो तलाक का आधार बन सके।
अलग रहना भी अपने आप में desertion नहीं
पति ने यह भी कहा था कि पत्नी दिसंबर 2019 से उससे अलग रह रही थी और वापस नहीं आई।
लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी और उसकी मां का लगातार यह कहना था कि पति उसे वापस लेने नहीं आया।
रिकॉर्ड के अनुसार, पत्नी के गर्भपात के समय उसकी मां उससे मिलने गई थीं और पति के परिवार ने पत्नी को मां के साथ भेज दिया था। पत्नी ने भी कहा कि पति ने उसे वापस लाने या साथ रखने की कोशिश नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि पति यह साबित नहीं कर पाया कि पत्नी ने वैवाहिक संबंध खत्म करने की नीयत से उसे छोड़ा था। इसलिए जरूरी animus deserendi भी साबित नहीं हुआ।
पति की अपील खारिज
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड और सबूतों का सही मूल्यांकन किया था और उसके फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
इसलिए पति की अपील खारिज कर दी गई। कोर्ट ने कोई लागत नहीं लगाई।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: आकाश घोष बनाम श्रीमती पूजा सीत
केस नंबर: FA(MAT) No. 325 of 2024
बेंच: जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत
तारीख: 18 सितंबर 2026

