जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में जम्मू-कश्मीर प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (जेकेपीसीसी) के एक पूर्व कर्मचारी का वर्षों से चला आ रहा निलंबन रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी के खिलाफ बिना विभागीय जांच शुरू किए उसे लंबे समय तक निलंबित रखना महज एक अंतरिम प्रशासनिक कदम नहीं रहता, बल्कि यह एक सजा का रूप ले लेता है जिससे कर्मचारी पर गहरा सामाजिक कलंक भी लगता है।
जस्टिस एम ए चौधरी की पीठ ने जेकेपीसीसी के पूर्व हेड असिस्टेंट की याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार और निगम को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए सेवा में बहाल माना जाए। साथ ही अदालत ने उनके सभी परिणामी वित्तीय बकाये का निपटारा करने और सेवा नियमों के तहत उनकी पेंशन प्रक्रिया पूरी कर जल्द जारी करने का आदेश दिया।
निलंबन केवल अस्थायी व्यवस्था, अनिश्चितकालीन दंडात्मक कदम नहीं
अदालत ने सेवा नियमों के कानूनी दायरे को रेखांकित करते हुए कहा कि निलंबन की मूल अवधारणा किसी कर्मचारी को जांच या अदालती कार्यवाही लंबित रहने तक अपने आधिकारिक दायित्वों और विशेषाधिकारों से केवल अस्थायी रूप से अलग रखना है। इसे स्थायी या अंतहीन व्यवस्था में नहीं बदला जा सकता।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि जब कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी को लंबे समय तक निलंबित रखता है और कोई औपचारिक विभागीय अनुशासनात्मक जांच भी पूरी नहीं करता, तो यह प्रशासनिक कदम दंडात्मक प्रकृति अख्तियार कर लेता है। ऐसे कदमों से कर्मचारी की प्रतिष्ठा और सामाजिक जीवन को होने वाले गंभीर नुकसान को देखते हुए अदालत ने माना कि अधिकारियों की इस अनिश्चितकालीन निष्क्रियता से निलंबन का वैधानिक आधार ही समाप्त हो जाता है।
याचिकाकर्ता को निगम ने 18 दिसंबर 2020 को निलंबित किया था। इसके बाद मामले का कोई विभागीय निस्तारण हुए बिना ही 31 मई 2021 को वे अपनी सेवानिवृत्ति की आयु पूरी कर सेवामुक्त हो गए थे।
2011 का विजिलेंस मामला और कर्मचारी की भूमिका
यह विवाद मूल रूप से सतर्कता संगठन (विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन) कश्मीर द्वारा साल 2011 में दर्ज एक प्राथमिकी से जुड़ा है। यह मामला जेकेपीसीसी के एक अन्य कर्मचारी द्वारा कथित तौर पर जाली शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सहारे नौकरी पाने से संबंधित था, जिसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) के तहत अपराध दर्ज किए गए थे।
जांच एजेंसी ने याचिकाकर्ता हेड असिस्टेंट को इस आधार पर मामले में सह-आरोपी बनाया कि उन्होंने शैक्षणिक दस्तावेजों का स्वतंत्र सत्यापन किए बिना ही उस आरोपी कर्मचारी की सर्विस बुक तैयार की थी।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष अपनी दलील में कहा कि प्रमाणपत्रों की सत्यता जांचने या उनका दोबारा सत्यापन कराने का न तो उनके पास कोई अधिकार था और न ही यह उनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा था। उन्होंने अदालत को बताया कि संबंधित आहरण एवं संवितरण अधिकारी (डीडीओ) ने इन शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच और स्वीकृति दशकों पहले यानी वर्ष 1991-92 में ही पूरी कर ली थी।
प्रशासनिक स्तर पर नौ साल की देरी पर अदालत की फटकार
हाईकोर्ट ने निगम और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में हुई गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने रेखांकित किया कि 2011 में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद अनंतनाग की भ्रष्टाचार निरोधक अदालत में आरोप पत्र पेश करने में ही जांच एजेंसियों को नौ साल का लंबा समय लग गया।
पीठ ने टिप्पणी की कि इस नौ साल की अवधि के दौरान जेकेपीसीसी ने आरोपों की सच्चाई जांचने के लिए न तो कोई प्रारंभिक तथ्य-अन्वेषण कराया और न ही याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई आंतरिक विभागीय जांच शुरू की।
अदालत ने कहा कि लगभग छह साल बीत जाने के बाद भी विभागीय आरोप पत्र न देने और जांच न कराने को लेकर निगम प्रबंधन कोई ठोस या उचित कारण पेश नहीं कर सका। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि तय समयसीमा में वैधानिक दायित्वों का निर्वहन न करने के कारण यह निलंबन आदेश टिकने योग्य नहीं है और इसे तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।

