सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और डीएमके नेता केएन नेहरू की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने कथित ₹634 करोड़ के कैश-फॉर-जॉब घोटाले में FIR दर्ज करने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के 20 फरवरी के फैसले और 26 अक्टूबर को पुनर्विचार याचिका खारिज करने के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मामले में आपराधिक जांच का रास्ता साफ बना हुआ है।
FIR दर्ज करने का मतलब दोषी ठहराना नहीं: हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने 26 अक्टूबर को नेहरू की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया था कि उसका पिछला आदेश केवल प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर मामला दर्ज करने और जांच करने तक सीमित था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि जांच का निर्देश देने का अर्थ नेहरू या किसी अन्य व्यक्ति को अपराध का दोषी ठहराना नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके 20 फरवरी के आदेश में दर्ज टिप्पणियां ED के आरोपों पर आधारित थीं। उन्हें अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट के अनुसार, आरोपों के समर्थन में उपलब्ध सामग्री की सत्यता और नेहरू या उनके रिश्तेदारों की कथित भूमिका की जांच संबंधित एजेंसी करेगी। इसके बाद आपराधिक अदालत तय करेगी कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप साबित होते हैं या नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करना आपराधिक प्रक्रिया का शुरुआती कदम है। इसके लिए उन सभी व्यक्तियों को पहले से सुनना आवश्यक नहीं है, जो आगे जांच के दायरे में आ सकते हैं। नेहरू को जांच के दौरान अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलेगा।
समय रहते आपत्ति नहीं उठाने पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
पुनर्विचार याचिका खारिज करते समय हाईकोर्ट ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि नेहरू ने मूल आदेश पारित होने से पहले अपनी आपत्तियां नहीं रखी थीं।
अदालत ने 4 फरवरी 2026 को फैसला सुरक्षित रखा था और 20 फरवरी को सुनाया था। दोनों तारीखों के बीच 16 दिनों का अंतर था।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि नेहरू कोई अतिरिक्त तथ्य या दलील अदालत के सामने रखना चाहते थे, तो इस अवधि में आवेदन दाखिल कर सकते थे। हालांकि, उन्होंने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया।
अदालत ने माना कि यह स्थिति महाधिवक्ता की उस दलील का समर्थन करती है कि पुनर्विचार याचिकाकर्ता ने पहले कार्यवाही जारी रहने दी और बाद में आदेश पर आपत्ति उठाई।
राज्य सरकार ने वापस ली पुनर्विचार याचिका
तमिलनाडु सरकार ने भी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। हालांकि, सरकार के इसे वापस लेने के बाद अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
इसी मामले में 20 फरवरी के आदेश का पालन नहीं होने को लेकर अवमानना याचिका भी दाखिल की गई थी।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया कि संबंधित अधिकारी दर्ज FIR के आधार पर जांच आगे बढ़ाएंगे।
इस आश्वासन और पुनर्विचार याचिका वापस लिए जाने को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अवमानना याचिका में उठाई गई शिकायत का समाधान हो गया है।
2021 से 2026 के बीच भर्ती में अनियमितताओं के आरोप
यह मामला तमिलनाडु में 2021 से 2026 तक डीएमके सरकार के कार्यकाल के दौरान सरकारी नौकरियों के बदले पैसे लेने के कथित घोटाले से संबंधित है।
तिरुचिरापल्ली के वरिष्ठ डीएमके नेता केएन नेहरू इस अवधि में नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग के मंत्री थे।
प्रवर्तन निदेशालय ने कथित ₹634 करोड़ के कैश-फॉर-जॉब घोटाले से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई थी। इसके आधार पर मद्रास हाईकोर्ट ने सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) को आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नेहरू की याचिका खारिज किए जाने के बाद हाईकोर्ट का जांच संबंधी आदेश बरकरार है।
