बच्चे का कल्याण सर्वोपरि: मद्रास हाईकोर्ट ने 11 वर्षीय बच्ची को नानी के पास रहने की अनुमति दी, मां की याचिका खारिज

मद्रास हाईकोर्ट ने 11 वर्षीय बच्ची की कस्टडी उसकी नानी के पास बरकरार रखने की अनुमति देते हुए मां की बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका का निपटारा कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में उनका कल्याण और सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अदालत को ऐसा पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह माना जा सके कि बच्ची को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है।

जस्टिस एम. निर्मल कुमार और जस्टिस एन. गुणशेखरन की डिवीजन बेंच ने 27 अक्टूबर के आदेश में बच्ची के पालन-पोषण, सामाजिक जांच रिपोर्ट और परिवार के सदस्यों से बातचीत पर विचार किया। कोर्ट ने बच्ची को तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में अपनी नानी के साथ रहने की अनुमति दी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने नानी को बच्ची की सुरक्षा, शिक्षा और समग्र कल्याण सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही बच्ची की मां और मौसी को उससे मिलने और उसके साथ समय बिताने की अनुमति देने को भी कहा।

मां ने नानी के घर बच्ची के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाया

मामला तब हाईकोर्ट पहुंचा जब बच्ची की मां ने आरोप लगाया कि नानी के घर में उसकी बेटी के साथ दुर्व्यवहार हुआ था।

याचिका के अनुसार, महिला की शादी जनवरी 2015 में हुई थी। पति की क्रूरता के आधार पर जून 2018 में उनका तलाक हो गया। महिला चेन्नई में काम करती है और उसने वर्ष 2017 में अपनी लगभग दो वर्षीय बेटी को तिरुनेलवेली में अपनी मां की देखभाल में छोड़ दिया था।

महिला का कहना था कि वह नियमित रूप से बेटी से मिलने जाती थी और उसकी जरूरतों का खर्च भी उठाती थी।

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मां ने आरोप लगाया कि नानी के घर एक व्यक्ति के लगातार आने-जाने के कारण बच्ची को परेशानी होने लगी। जब बच्ची ने उसके आने पर आपत्ति जताई तो उस व्यक्ति ने उसके साथ मारपीट की। महिला ने दो पड़ोसियों पर भी बच्ची के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया।

अपनी बहन से इन घटनाओं की जानकारी मिलने के बाद महिला ने 5 अक्टूबर 2026 को चेरनमहादेवी के महिला पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस जांच के बाद बच्ची को बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया गया और एक बाल देखभाल संस्थान में रखा गया। इसके बाद मां ने बेटी की कस्टडी पाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

सामाजिक जांच रिपोर्ट में पारिवारिक संपत्ति विवाद का उल्लेख

सुनवाई के दौरान पुलिस ने कोर्ट को बताया कि जांच में कुछ आरोप बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए पाए गए। पुलिस ने सामाजिक कल्याण अधिकारी की तैयार की गई सामाजिक जांच रिपोर्ट भी पेश की।

रिपोर्ट के अनुसार, बच्ची लगभग दो वर्ष की उम्र से अपनी नानी के पास रह रही थी। नानी उसकी शिक्षा और अन्य जरूरतों की जिम्मेदारी निभा रही थीं। बच्ची फिलहाल एक निजी स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ती है।

रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि बच्ची की मां ने दूसरी शादी कर ली है और उस विवाह से उसका एक और बच्चा है।

रिपोर्ट में परिवार के भीतर संपत्ति विवाद की संभावना का भी उल्लेख किया गया। इसके अनुसार, नानी ने हाल ही में कुछ मकान खरीदे थे। उनकी दोनों बेटियों को आशंका थी कि ये संपत्तियां उनके बजाय किसी तीसरे व्यक्ति के नाम की जा सकती हैं।

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रिपोर्ट में यह संभावना भी जताई गई कि नानी के व्यक्तिगत आचरण और उनके घर आने वाले व्यक्ति द्वारा कथित यौन उत्पीड़न से जुड़े आरोप पारिवारिक विवाद की पृष्ठभूमि में लगाए गए हों।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सामाजिक जांच रिपोर्ट में उल्लेख होने से इन आरोपों को साबित नहीं माना जा सकता। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही इनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

नानी ने बच्ची की सुरक्षा का आश्वासन दिया

नानी की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि वह एक शिक्षिका हैं और उन्होंने बच्ची को स्नेह, शिक्षा तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं प्रदान करते हुए उसका पालन-पोषण किया है।

घर आने वाले व्यक्ति के संबंध में वकील ने बताया कि वह एक पादरी है, जो प्रार्थना कराने के लिए आता था।

नानी ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि भविष्य में उस व्यक्ति को घर आने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि प्रार्थना की जरूरत होगी तो वह केवल चर्च में होगी।

उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि किसी अनधिकृत व्यक्ति को घर में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा, जिससे बच्ची को किसी प्रकार की परेशानी या असुविधा हो।

नानी ने बच्ची की शिक्षा, सुरक्षा और अन्य जरूरतों की जिम्मेदारी आगे भी निभाने की बात कही। उन्होंने बच्ची की मां और मौसी के उससे मिलने पर भी कोई आपत्ति नहीं जताई।

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अवैध हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं मिला

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाने से पहले बच्ची, उसकी मां और नानी से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की।

बेंच ने पाया कि बच्ची बचपन से अपनी नानी के साथ रह रही है और नानी ने कई वर्षों से उसकी शिक्षा तथा पालन-पोषण की जिम्मेदारी संभाली है।

कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों और सामाजिक जांच रिपोर्ट के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है कि बच्ची को अवैध हिरासत में रखा गया है। इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी करने का आधार नहीं बनता।

बेंच ने दोहराया कि ऐसे मामलों में बच्चे का कल्याण और उसका सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण है।

इन निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने मां की याचिका का निपटारा करते हुए बच्ची को नानी के पास रहने की अनुमति दी। हालांकि, यह अनुमति नानी द्वारा कोर्ट में दिए गए आश्वासनों के अधीन रहेगी।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि नानी बच्ची की सुरक्षा, शिक्षा और समग्र कल्याण सुनिश्चित करेंगी। साथ ही मां और मौसी को बच्ची से मिलने तथा उसके साथ समय बिताने की अनुमति देनी होगी।

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