सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान ने कहा है कि लोकतंत्र और कानून के शासन को मजबूत बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक सोच, सूचना तक पहुंच और सवाल पूछने की स्वतंत्रता जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि जो समाज सवाल उठाने से डरता है, वह तानाशाही का शिकार हो सकता है। इसी तरह परंपराओं को आलोचना से परे रखने वाला समाज अन्यायपूर्ण प्रथाओं में सुधार करने से चूक सकता है।
जस्टिस भुयान ने शनिवार को यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी मेघालय के 12वें दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि अज्ञानता, भय और बिना जांचे-परखे विश्वासों के कारण मनमानी सत्ता को बढ़ावा मिलता है।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण लोगों को किसी भी दावे को बिना प्रमाण स्वीकार करने के बजाय उसकी जांच करने के लिए प्रेरित करता है। बिना सबूत दावों को स्वीकार करने वाला समाज अंधविश्वास और गलत सूचनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
लोकतंत्र के लिए सूचना तक पहुंच जरूरी
जस्टिस भुयान ने सार्वजनिक तर्क-विमर्श को स्वस्थ भागीदारी वाले लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी के लिए नागरिकों का जागरूक होना जरूरी है और यह तभी संभव है, जब उन्हें पर्याप्त जानकारी उपलब्ध हो।
उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की वर्ष 2009 में प्रकाशित पुस्तक द आइडिया ऑफ जस्टिस का उल्लेख किया। इस पुस्तक में अमर्त्य सेन ने संस्थागत लोकतंत्र और कार्यात्मक लोकतंत्र के बीच अंतर स्पष्ट किया है।
जस्टिस भुयान के अनुसार, सूचनाओं का प्रसार और सार्वजनिक तर्क-विमर्श के माध्यम से उनकी जांच लोकतांत्रिक समाज में न्याय सुनिश्चित करने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि जानकारी के बिना नागरिक विभिन्न दावों का मूल्यांकन नहीं कर सकते और न ही लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं।
विश्वविद्यालयों में विविधता का सम्मान करना जरूरी
शिक्षण संस्थानों की भूमिका पर चर्चा करते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल किताबों से ज्ञान प्राप्त करने का स्थान नहीं हैं। यहां छात्रों को अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, क्षेत्रों, जातीय और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों के साथ रहने और सीखने का अवसर मिलता है।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग परिवेश से आने वाले छात्रों की परवरिश, खानपान, सोच और सांस्कृतिक पहचान भिन्न हो सकती है। ऐसी विविधता हमें अपनी पुरानी धारणाओं पर दोबारा विचार करने और साझा मूल्यों को समझने का अवसर देती है।
जस्टिस भुयान ने विविधता को समाज की ताकत बताते हुए कहा कि इसे अपनाना चाहिए, न कि इससे दूरी बनानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक महत्व तब सामने आता है, जब लोग असहमति के बावजूद एक-दूसरे के विचारों को समझने और उनका सम्मान करने का प्रयास करते हैं। विविधता की समझ समाज को अधिक समावेशी और सहिष्णु बनाने में मदद करती है।
जस्टिस भुयान ने चेताया कि सामाजिक संघर्ष और अलग-अलग समूहों के प्रतिस्पर्धी दावे अक्सर लोगों को दूसरों से अलग रहने की सोच की ओर ले जाते हैं। इससे समाज में ‘हम’ और ‘वे’ जैसी विभाजनकारी मानसिकता विकसित होती है।
संविधान का ‘हम’ सभी नागरिकों की समानता का प्रतीक
जस्टिस भुयान ने कहा कि अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज बनाने के लिए ‘हम’ और ‘वे’ की विभाजनकारी सोच से बाहर निकलना जरूरी है। इसके स्थान पर सभी को साथ लेकर चलने वाली सामूहिक पहचान विकसित करनी चाहिए।
उन्होंने भारतीय संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी शुरुआत ‘हम, भारत के लोग’ शब्दों से होती है। यह अभिव्यक्ति किसी एक समुदाय या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी नागरिकों को समान संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा मानती है।
जस्टिस भुयान ने स्पष्ट किया कि संविधान देश के किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए है। अलग-अलग व्यक्तिगत, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान होने के बावजूद सभी लोग एक साझा संवैधानिक ढांचे से जुड़े हैं।
उन्होंने कहा कि ‘हम’ की संवैधानिक अवधारणा एक व्यापक सामूहिक पहचान को दर्शाती है, जिसमें व्यक्तिगत या समूह की पहचान साझा संवैधानिक एकता को कमजोर नहीं करती।
जस्टिस भुयान ने छात्रों से विविधता को अपनाने, अलग-अलग विचारों का सम्मान करने और समाज को अधिक न्यायपूर्ण तथा मानवीय बनाने के लिए विभाजनकारी सोच से दूर रहने का आह्वान किया।
