पांच दिन अवैध पुलिस हिरासत में रखने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया ₹1.25 लाख मुआवजे का आदेश, युवक को तत्काल रिहा करने का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक युवक को गिरफ्तारी दर्ज किए बिना पांच दिन तक अवैध पुलिस हिरासत में रखने के मामले में 1.25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने प्रत्येक दिन की अवैध हिरासत के लिए 25,000 रुपये मुआवजा निर्धारित किया और युवक को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत आवश्यक न हो।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने चंदन राजभर की मां और पत्नी की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस की अपनी जांच में भी स्वीकार किया गया था कि चंदन को 28 अगस्त 2026 से 2 सितंबर 2026 तक अवैध हिरासत में रखा गया और बाद में उसकी गिरफ्तारी दर्ज की गई।

पुणे से युवक को पकड़कर देवरिया लाने का मामला

मामले की शुरुआत 18 जुलाई 2026 को हुई, जब चंदन की पत्नी की मां ने देवरिया जिले के सलेमपुर थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 के तहत एफआईआर दर्ज कराई।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि चंदन 14 जुलाई 2026 को उनकी 18 वर्षीय बेटी को अपने साथ भगा ले गया था।

याचिका के अनुसार, दोनों ने बिहार के सीवान स्थित दुर्गा मंदिर में विवाह किया और इसके बाद पुणे चले गए।

सलेमपुर थाने के पुलिसकर्मी युवती के पिता के साथ पुणे पहुंचे और दोनों को हिरासत में लेकर 27-28 अगस्त 2026 की रात सलेमपुर थाने ले आए।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चंदन को 28 अगस्त से 2 सितंबर तक गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया। उसकी गिरफ्तारी का मेमो 2 सितंबर को तैयार किया गया।

READ ALSO  पत्नी की ‘हत्या’ के आरोप में डेढ़ साल जेल में रहा शख्स, जीवित पत्नी कोर्ट में पहुंची

हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर 2026 को पुलिस को इस अवधि की थाने की सीसीटीवी फुटेज पेश करने का निर्देश दिया था।

पुलिस की जांच में अवैध हिरासत और फर्जी गिरफ्तारी की पुष्टि

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अवधेश कुमार उपस्थित हुए।

सुनवाई के दौरान सीसीटीवी फुटेज पेश की गई। हालांकि, राज्य के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि देवरिया के पुलिस अधीक्षक के हलफनामे को देखते हुए फुटेज देखने की आवश्यकता नहीं भी हो सकती है।

राज्य की ओर से 21 अक्टूबर 2026 की क्षेत्राधिकारी की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।

रिपोर्ट में स्वीकार किया गया कि जांच अधिकारी दीप नारायण यादव ने जानबूझकर 28 अगस्त को चंदन को हिरासत में लिया और 2 सितंबर तक अवैध रूप से बंद रखा।

इसके बाद 2 सितंबर को उसकी गिरफ्तारी दिखाई गई।

जांच रिपोर्ट में इसे फर्जी गिरफ्तारी बताते हुए जांच अधिकारी के आचरण को कर्तव्य के निर्वहन में गंभीर लापरवाही माना गया।

पुलिस अधीक्षक ने उसी दिन संबंधित जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी थी।

पुलिस अधिकारी ने कानून की प्रक्रिया का पालन नहीं किया: हाईकोर्ट

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल की अतिरिक्त कानूनी बैठकों के अनुरोध पर तिहाड़ से जवाब मांगा

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की जांच रिपोर्ट से याचिकाकर्ताओं का अवैध हिरासत संबंधी आरोप सही साबित होता है।

बेंच ने जांच अधिकारी के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कहा:

“जांच अधिकारी ने जिस तरह अपने अधिकार का अहंकार दिखाते हुए याचिकाकर्ता संख्या 2 को पूरे पांच दिन तक हिरासत में रखा, वह भी बिना दोबारा सोचे और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वह इसे सामान्य कामकाज मानता था।”

कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय जांच में जांच अधिकारी दोषी पाया जाता है, तो उसके जानबूझकर किए गए कृत्यों के लिए सबसे कठोर दंड देने पर विचार किया जाना चाहिए।

बेंच ने कहा:

“यह अदालत अपेक्षा करती है कि यदि विभागीय जांच में जांच अधिकारी उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों में दोषी पाया जाता है, तो उसके जानबूझकर किए गए कृत्यों के लिए सबसे कठोर दंड देने पर विचार किया जाए।”

सच्चाई सामने लाने वाले पुलिस अधिकारियों की सराहना

हाईकोर्ट ने जांच रिपोर्ट में वास्तविक तथ्य सामने रखने वाले अधिकारियों की सराहना की।

कोर्ट ने कहा:

“यह अदालत क्षेत्राधिकारी द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट के माध्यम से वास्तविक तथ्यों को अदालत के सामने प्रकट करने में दिखाई गई स्पष्टवादिता और ईमानदारी की सराहना करती है।”

बेंच ने राज्य सरकार से अनुरोध किया कि रुद्रपुर के क्षेत्राधिकारी राजेश चतुर्वेदी और देवरिया के पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर. शंकर की सेवा पुस्तिकाओं में इस मामले में पूर्ण और सत्य जानकारी प्रस्तुत करने के लिए प्रशंसा दर्ज की जाए।

₹1.25 लाख मुआवजा, दोषी अधिकारियों से वसूली की छूट

READ ALSO  लोकतंत्र में कथित भेदभाव के खिलाफ धरना देकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रशासन के खिलाफ विरोध करने का अधिकार है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने चंदन राजभर की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, यदि किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत जरूरी न हो।

कोर्ट ने पांच दिन की अवैध हिरासत के लिए 25,000 रुपये प्रतिदिन की दर से कुल 1.25 लाख रुपये मुआवजा निर्धारित किया।

साथ ही स्पष्ट किया:

“इससे याचिकाकर्ता संख्या 2 के पुलिस विभाग के खिलाफ अपकृत्य के आधार पर हर्जाने का मुकदमा दायर करने के अधिकार पर कोई रोक नहीं लगेगी।”

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जांच के बाद अवैध हिरासत के लिए दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों से मुआवजे की रकम वसूलने की छूट भी दी।

बेंच ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियों का लंबित आपराधिक मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Gyanti Devi and 2 Others v. State of U.P. and 3 Others

केस नंबर: Habeas Corpus Writ Petition No. 1449 of 2026

पीठ: जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव

फैसले की तारीख: 29 अक्टूबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles