वैध टर्मिनेशन नोटिस से खत्म हो सकता है डिमाइज चार्टर, जहाज का भौतिक कब्जा लेना जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जहां बेयरबोट चार्टर एग्रीमेंट में वैध नोटिस के जरिए चार्टर खत्म करने का स्पष्ट प्रावधान हो और टर्मिनेशन के बाद वास्तविक कब्जा मिलने तक चार्टरर को केवल gratuitous bailee यानी बिना किसी स्वतंत्र उपयोग-अधिकार के संरक्षक के रूप में माना गया हो, वहां जहाज का भौतिक कब्जा वापस लेना डिमाइज चार्टर खत्म होने की जरूरी शर्त नहीं है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द कर दिया, जिसमें M.V. Nereus Progress की गिरफ्तारी बरकरार रखी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने जहाज की गिरफ्तारी हटाने का आदेश दिया।

कोर्ट ने माना कि जहाज के रजिस्टर्ड मालिक और Nereides Marine Services के बीच हुआ बेयरबोट चार्टर 13 नवंबर 2025 को वैध रूप से समाप्त हो चुका था, जबकि जहाज की गिरफ्तारी 4 दिसंबर 2025 को हुई। टर्मिनेशन के बाद Nereides की हैसियत demise charterer की नहीं रही थी और वह केवल gratuitous bailee के रूप में जहाज अपने पास रखे हुए था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद M.V. Nereus Progress के रजिस्टर्ड मालिक और Om Freight Forwarders Ltd. के बीच था। Om Freight Forwarders, Nereides Marine Services का लेनदार था।

M.V. Nereus Progress के मालिक ने 3 अक्टूबर 2024 को BIMCO BARECON 2017 फॉर्म के तहत जहाज Nereides को बेयरबोट चार्टर पर दिया था। दूसरी ओर, Om Freight Forwarders ने भी अपना जहाज M.V. Bharadwaj, Nereides को एक अलग बेयरबोट चार्टर के तहत दिया हुआ था।

बाद में Nereides ने M.V. Nereus Progress के मालिक को देय hire का भुगतान करना बंद कर दिया। मालिक ने सितंबर और अक्टूबर 2025 के बीच कई डिमांड नोटिस जारी किए।

इसके बाद 6 नवंबर 2025 को Anti-Technicality Notice जारी कर Nereides को तीन बैंकिंग दिनों का समय दिया गया। भुगतान न होने पर 13 नवंबर 2025 को Clause 31 के तहत चार्टर समाप्त कर दिया गया। इसके बाद 19 नवंबर को Repossession Notice भी जारी किया गया।

इसी दौरान Nereides ने Om Freight Forwarders को भी M.V. Bharadwaj के चार्टर के तहत भुगतान नहीं किया था। Om Freight Forwarders ने Admiralty (Jurisdiction and Settlement of Maritime Claims) Act, 2017 की Sections 5(1)(b) और 5(2) के तहत मद्रास हाईकोर्ट में Commercial Suit No. 314 of 2025 दाखिल किया।

उसने M.V. Nereus Progress को sister vessel बताते हुए उसकी गिरफ्तारी मांगी। दावा था कि Nereides अब भी उस जहाज का demise charterer था।

4 दिसंबर 2025 को, इससे पहले कि जहाज का मालिक Tuticorin Port पर उसका वास्तविक कब्जा ले पाता, Om Freight Forwarders ने जहाज की गिरफ्तारी का ex parte आदेश हासिल कर लिया।

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मद्रास हाईकोर्ट के सिंगल जज ने गिरफ्तारी वापस लेने की मांग ठुकरा दी। बाद में डिवीजन बेंच ने भी आदेश बरकरार रखा और माना कि सामान्य तौर पर demise charter केवल contractual termination से खत्म नहीं होता, बल्कि physical redelivery भी जरूरी होती है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं

जहाज मालिक की ओर से सीनियर एडवोकेट Atmaram Nadkarni और Shikhil Suri ने दलील दी कि Admiralty Act की Section 5(1)(b) के तहत गिरफ्तारी तभी संभव थी जब Nereides गिरफ्तारी की तारीख पर भी demise charterer रहता।

उनका कहना था कि 13 नवंबर 2025 को चार्टर पहले ही समाप्त हो चुका था, इसलिए यह जरूरी शर्त पूरी नहीं होती थी।

मालिक ने खास तौर पर BIMCO BARECON 2017 के Clauses 31 और 32 पर भरोसा किया। Clause 32 में स्पष्ट था कि टर्मिनेशन के बाद और वास्तविक repossession होने तक charterer जहाज को केवल gratuitous bailee के रूप में रखेगा।

Om Freight Forwarders की ओर से वकील Ashwin Shanker ने अपील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि Nereides जहाज पर नियंत्रण बनाए हुए था और उसका व्यावसायिक उपयोग भी कर रहा था, इसलिए वास्तविक redelivery और repossession से पहले demise charter खत्म नहीं माना जा सकता।

यह भी दलील दी गई कि Nereides जहाज को gratuitous bailee के रूप में रख रहा था या demise charterer के रूप में, यह तथ्य और कानून दोनों से जुड़ा सवाल है, जिसका फैसला ट्रायल में होना चाहिए।

टर्मिनेशन वैध था: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मालिक और Nereides के बीच हुए पत्राचार का अध्ययन किया और पाया कि Nereides से USD 696,500 के बकाये का भुगतान मांगा गया था।

कई नोटिस देने और तीन बैंकिंग दिनों का अतिरिक्त समय देने के बावजूद कोई भुगतान नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि Nereides ने कभी यह विवाद नहीं उठाया कि hire का भुगतान बाकी नहीं था। 14 नवंबर 2025 के अपने पत्र में उसने टर्मिनेशन नोटिस स्वीकार किया था और एक महीने का और समय मांगा था। साथ ही उसने कहा था कि भुगतान न होने पर वह मालिक के टर्मिनेशन के फैसले को स्वीकार करेगा और जहाज का व्यवस्थित हैंडओवर करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि BBC का टर्मिनेशन उचित और वैध था।”

कोर्ट ने M/s Tomorrowland Limited v. Housing and Urban Development Corporation Limited & Anr. के फैसले का भी उल्लेख किया और कहा कि कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट की स्पष्ट शर्तों को उसी तरह लागू किया जाना चाहिए, जैसा पक्षकारों ने तय किया है।

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भौतिक कब्जा टर्मिनेशन की शर्त नहीं, उसका अगला चरण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय अदालतों में यह सटीक सवाल पहले निर्णायक रूप से तय नहीं हुआ था कि demise charter खत्म करने के लिए जहाज का actual physical repossession जरूरी है या वैध termination notice ही पर्याप्त हो सकता है।

दोनों पक्षों ने अलग-अलग विदेशी फैसलों पर भरोसा किया।

Singapore High Court के The Chem Orchid और Sri Lankan Court of Appeal के Navi-Bunkering Corp मामलों में यह राय ली गई थी कि वास्तविक कब्जा मालिक को वापस मिलने तक demise charterer की स्थिति बनी रह सकती है।

इसके विपरीत Federal Court of Australia के The Hako Fortress और Hong Kong Court of First Instance के M.V. Trident Dawn मामलों में माना गया था कि कुछ स्थितियों में termination clause नोटिस जारी होते ही प्रभावी हो सकता है और repossession अलग प्रक्रिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इनमें से किसी विदेशी फैसले को सीधे लागू करने के बजाय इस मामले का फैसला संबंधित contract की वास्तविक भाषा के आधार पर किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने Clause 32 को महत्वपूर्ण माना।

उसने कहा:

“Clause 32 के शुरुआती शब्द यह स्पष्ट करते हैं कि जहाज का repossession पहले से हो चुके termination का परिणाम है, न कि ऐसी घटना जिस पर termination निर्भर हो।”

कोर्ट ने demise charterer और gratuitous bailee की स्थिति में भी स्पष्ट अंतर बताया।

Demise charterer जहाज का कब्जा और नियंत्रण मालिक की तरह रखता है और उसका व्यावसायिक उपयोग कर सकता है। इसके विपरीत gratuitous bailee के पास ऐसा स्वतंत्र व्यावसायिक अधिकार नहीं रहता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“इसमें कोई संदेह नहीं कि जब charterparty टर्मिनेशन के बाद charterer को ‘gratuitous bailee’ मानती है, तो उसकी ‘demise charterer’ वाली स्थिति जारी नहीं रह सकती।”

कोर्ट ने Clauses 31 और 32 को साथ पढ़ते हुए कहा कि Clause 31 के तहत नोटिस जारी होते ही termination प्रभावी हो गया था। Clause 32 केवल इसके बाद जहाज का वास्तविक नियंत्रण वापस लेने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता था।

डिफॉल्ट करने वाला चार्टरर मालिक के अधिकार को रोक नहीं सकता

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि physical repossession को termination की अनिवार्य शर्त मान लिया जाए, तो defaulting charterer जहाज न सौंपकर मालिक के अधिकार को अनिश्चित समय तक रोक सकता है।

कोर्ट ने कहा:

“यदि वैध termination notice के बावजूद charterer की demise status तब तक जारी मानी जाए जब तक वह physical possession अपने पास रख सकता है, तो मालिक का contractual right of termination उसी default का बंधक बन जाएगा, जिसके कारण उसे यह अधिकार इस्तेमाल करना पड़ा।”

Sister Ship Arrest की जरूरी शर्त पूरी नहीं हुई

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने Admiralty Act की Section 5(1)(b) और Section 5(2) का विश्लेषण किया।

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कोर्ट ने कहा कि Om Freight Forwarders का वास्तविक maritime claim M.V. Bharadwaj से जुड़ा था, M.V. Nereus Progress से नहीं।

इसलिए M.V. Nereus Progress को sister vessel के रूप में गिरफ्तार करने के लिए यह साबित करना जरूरी था कि Nereides maritime claim पैदा होने के समय भी उसका demise charterer था और 4 दिसंबर 2025 को गिरफ्तारी के समय भी उसका वही दर्जा था।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि दूसरी शर्त पूरी नहीं हुई।

चार्टर 13 नवंबर 2025 को ही वैध रूप से समाप्त हो चुका था। इसके बाद Clause 32 के तहत Nereides की हैसियत केवल gratuitous bailee की रह गई थी।

कोर्ट ने यह भी पाया कि जहाज मालिक ने repossession के लिए लगातार प्रयास किए थे और वास्तविक कब्जा लेने में हुई देरी Nereides के कारण हुई थी।

Nereides के अपने पत्राचार से भी स्पष्ट था कि उसने टर्मिनेशन स्वीकार कर लिया था और जहाज के handover तथा repossession की प्रक्रिया चल रही थी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि Clause 31(a) के तहत वैध termination notice demise charter खत्म करने के लिए पर्याप्त था। उसके बाद physical repossession केवल जहाज का वास्तविक नियंत्रण वापस लेने की प्रक्रिया थी।

कोर्ट ने माना कि Nereides 4 दिसंबर 2025 से काफी पहले ही M.V. Nereus Progress का demise charterer रहना बंद कर चुका था और उस समय केवल gratuitous bailee था।

चूंकि जहाज की गिरफ्तारी इस गलत आधार पर की गई थी कि गिरफ्तारी की तारीख पर भी Nereides demise charterer था, इसलिए गिरफ्तारी का आदेश टिक नहीं सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए अपील मंजूर कर ली और M.V. Nereus Progress की गिरफ्तारी हटाने का आदेश दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Owners and Parties Interested in M.V. Nereus Progress v. Om Freight Forwarders Ltd.

केस नंबर: Civil Appeal of 2026 arising out of SLP (C) No. 23834 of 2026

बेंच: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना

तारीख: 25 सितंबर 2026

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