एनसीएलटी नियुक्तियों और बुनियादी ढांचे से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई टाली

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में सदस्यों की नियुक्ति में हो रही देरी और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कमियों पर स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई सुनवाई को टाल दिया है। अदालत ने सोमवार को इस मामले को स्थगित करते हुए कहा कि न्यायाधिकरण में रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया वर्तमान में जारी है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। कार्यवाही के दौरान एक वकील ने पीठ को बताया कि स्वतः संज्ञान का यह मामला केवल एनसीएलटी के खाली पदों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें न्यायाधिकरण के बुनियादी ढांचे की कमी और मुकदमों के निपटारे की धीमी दर जैसे महत्वपूर्ण विषय भी शामिल हैं। इस पर सहमति व्यक्त करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत की दूसरी पीठ द्वारा उठाए गए यह मुद्दे वास्तव में बेहद गंभीर चिंता का विषय हैं।

कैसे शुरू हुई स्वतः संज्ञान की कार्यवाही

यह स्वतः संज्ञान मामला, जिसका शीर्षक ‘इन री: अपॉइंटमेंट ऑफ ज्यूडिशियल एंड टेक्निकल मेंबर्स एंड इनएडिक्वेट इंफ्रास्ट्रक्चर इन नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) एंड एनसिलरी इश्यूज’ है, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 19 मई को दर्ज किया गया था। इस कार्यवाही की शुरुआत 29 अप्रैल को ‘एवीजे हाइट्स अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन बनाम आईआईएफएल फाइनेंस लिमिटेड’ मामले में आए एक फैसले के बाद हुई।

उस फैसले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के तहत समाधान योजनाओं (रिजॉल्यूशन प्लान) की मंजूरी में होने वाली अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। स्थिति को गंभीर बताते हुए पीठ ने आवश्यक निर्देशों के लिए इस मामले को चीफ जस्टिस के पास भेज दिया था, जिसके बाद यह स्वतः संज्ञान मामला पंजीकृत किया गया।

लंबित मुकदमों और देरी के चौंकाने वाले आंकड़े

अदालत ने अपने 29 अप्रैल के फैसले में रेखांकित किया था कि एनसीएलटी के समक्ष समाधान योजनाओं की मंजूरी के लिए 383 आवेदन लंबित पड़े हुए थे। इन मामलों में देरी की अवधि 48 दिनों से लेकर 738 दिनों तक की थी, और कुछ मामले तो पिछले लगभग चार वर्षों से लंबित पड़े थे।

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जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथन की पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि इतनी लंबी देरी दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के मूल उद्देश्यों को ही समाप्त कर देती है। अदालत ने आगाह किया था कि समाधान में अत्यधिक समय लगने से समयबद्ध तरीके से दिवाला निपटारा करने, संपत्तियों के मूल्य को सुरक्षित रखने और देश की आर्थिक दक्षता को बढ़ावा देने का आईबीसी का मुख्य उद्देश्य पूरी तरह निष्प्रभावी हो जाता है।

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