1998 मध्य प्रदेश शिक्षक भर्ती मामला: हाईकोर्ट ने आठों आरोपियों को किया बरी, कहा- प्रशासनिक गलती और अपराध में अंतर

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वर्ष 1998 की शिक्षक भर्ती में कथित भ्रष्टाचार के मामले में सजा पा चुके आठ लोगों को बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आपराधिक इरादा साबित करने में नाकाम रहा। इसके साथ ही मुख्य गवाहों के मुकरने और केवल फोटोकॉपी दस्तावेजों पर भरोसा करने के कारण निचली अदालत का फैसला कानूनी रूप से सही नहीं था।

जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने आरोपियों की आपराधिक अपीलों को स्वीकार करते हुए 12 अगस्त 2010 के निचली अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया। प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायाधीश ने सभी आठों अभियुक्तों को दो-दो साल की सश्रम कैद और 10-10 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माना न भरने पर छह महीने की अतिरिक्त जेल भुगतने का भी आदेश दिया गया था।

मुकरे गवाह और कमजोर साक्ष्य

हाईकोर्ट ने सबूतों का विश्लेषण करते हुए पाया कि सुनवाई के दौरान लगभग सभी प्रमुख शिकायतकर्ता और उम्मीदवार अपने बयानों से मुकर गए। गवाहों ने अदालत में कहा कि उन्होंने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी या फिर लोकायुक्त पुलिस के अधिकारियों के कहने पर उनके हस्ताक्षर लिए गए थे। अदालत ने टिप्पणी की कि जब शिकायत करने वाले ही मूल दस्तावेजों से इनकार कर रहे हों, तो अभियोजन पक्ष का पूरा मामला ही गहरा संदेह पैदा करता है।

जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। पुलिस ने उम्मीदवारों और चयन समिति के सदस्यों के बीच रिश्तेदारी साबित करने के लिए मतदाता सूची और कुटुंब रजिस्टर की फोटोकॉपी पेश की थी। सुनवाई के दौरान स्थानीय तहसीलदार ने स्वीकार किया कि पुलिस द्वारा मूल रिकॉर्ड के बजाय केवल फोटोकॉपी दिखाए जाने के कारण वह इन दस्तावेजों की पुष्टि करने में असमर्थ थे। हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों के मुकरने और असत्यापित फोटोकॉपी के आधार पर किसी को दोषी ठहराना कानूनन अनुचित है।

READ ALSO  थाणे ट्रिब्यूनल का फैसला: सड़क हादसे में जान गंवाने वाले कार चालक के परिजनों को मिलेगा 31.43 लाख रुपये का मुआवजा

प्रशासनिक लापरवाही और आपराधिक कृत्य में अंतर

निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष अदालत ने प्रशासनिक लापरवाही और आपराधिक अपराध के बीच के अंतर को समझने में भूल की। निचली अदालत ने आरोपियों को मुख्य रूप से इसलिए दोषी ठहराया था क्योंकि उन्होंने अभ्यर्थियों के साथ अपने पारिवारिक संबंधों का खुलासा नहीं किया था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पंचायत सदस्य अपने पद का इस्तेमाल किसी रिश्तेदार को लाभ पहुंचाने के लिए करता है, तो उसके खिलाफ पंचायत अधिनियम के तहत पद से हटाने या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, यह कृत्य स्वतः ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक श्रेणी में नहीं आता। आपराधिक दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी की नीयत बेईमानी भरी थी और उसने इसके बदले कोई वित्तीय लाभ या रिश्वत ली थी। रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे रिश्वत या आर्थिक लेन-देन की पुष्टि होती हो। इसके अलावा, साक्षात्कार में अंक देना व्यक्तिगत विवेक का मामला है और अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि चयनित उम्मीदवार अयोग्य थे।

अफसरों की जवाबदेही और अभियोजन की मंजूरी

READ ALSO  In the Absence of Affixture of Notice, the Service of Summons on the Defendant Should Be Treated as Non-Service: Madhya Pradesh HC

हाईकोर्ट ने तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अशोक कुमार पांडे और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) विजय रेगे पर लगाए गए आरोपों को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अन्य चयनकर्ताओं के व्यक्तिगत अंक देने के पैटर्न के लिए पर्यवेक्षी अधिकारियों को अप्रत्यक्ष रूप से आपराधिक रूप से जवाबदेह (विकेरियस लायबिलिटी) नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि चयन समिति में मौजूद स्वतंत्र विशेषज्ञों ने प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और दबाव-मुक्त बताया था। अभियोजन पक्ष अपने ही गैर-विरोधी गवाहों की गवाही को खारिज नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त, लोक सेवकों पर मुकदमा चलाने के लिए दी गई कानूनी मंजूरी भी साक्ष्यों के स्वतंत्र मूल्यांकन के बिना जारी की गई थी।

READ ALSO  नरेंद्र दाभोलकर हत्या: बॉम्बे हाई कोर्ट ने जांच निष्कर्ष रिपोर्ट पर निर्णय लेने के लिए सीबीआई को चार सप्ताह का समय दिया

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 1998 में सांवेर जनपद पंचायत में 207 ग्रेड-III शिक्षक कर्मियों की नियुक्ति से जुड़ा है। कुल 2,539 आवेदनों में से 1,796 अभ्यर्थी 27 जून से 18 जुलाई 1998 के बीच आयोजित साक्षात्कारों में शामिल हुए थे। चयन प्रक्रिया के बाद स्वजन पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना ने जांच शुरू की थी। आरोप था कि चयन समिति के सदस्यों ने अधिकारियों की मिलीभगत से अपने रिश्तेदारों को इंटरव्यू में अधिकतम अंक देकर नौकरी दिलवाई थी।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles