2006 के भ्रष्टाचार मामले में रिटायर्ड चकबंदी अधिकारी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से अंतरिम राहत, कठोर कार्रवाई पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 2006 में दर्ज भ्रष्टाचार के एक मामले में 68 वर्षीय सेवानिवृत्त चकबंदी अधिकारी के खिलाफ अगली सुनवाई तक कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है और संबंधित पक्ष को नोटिस जारी किया है।

जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी ने राजेंद्र प्रसाद यादव की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दाखिल आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया।

याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दाखिल चार्जशीट और विशेष अदालत द्वारा जारी संज्ञान एवं समन आदेश को रद्द करने की मांग की है।

20 साल पुराने मामले में 2026 में दाखिल हुई चार्जशीट

मामला बाराबंकी जिले के असंद्रा थाने में वर्ष 2006 में दर्ज केस क्राइम नंबर 114/2006 से संबंधित है।

इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 166, 167, 467, 109 और 120-B के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(d) सहपठित धारा 13(2) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

जांच के बाद 14 जनवरी 2026 को राजेंद्र प्रसाद यादव के खिलाफ चार्जशीट नंबर 01/2026 दाखिल की गई।

इसके आधार पर अयोध्या की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), कोर्ट नंबर 01 ने स्पेशल ट्रायल नंबर 557/2026 में 6 जुलाई 2026 को संज्ञान लेते हुए समन आदेश जारी किया।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में इन दोनों कार्रवाइयों की वैधता को चुनौती दी है।

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विभागीय जांच में आरोपों से मुक्त होने की दी दलील

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिषेक सिंह ने अधिवक्ता अखंड कुमार पांडेय और यश द्विवेदी के साथ पक्ष रखा।

उन्होंने बताया कि राजेंद्र प्रसाद यादव 31 मई 2018 को चकबंदी अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

अधिवक्ताओं ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ चकबंदी अधिनियम के तहत प्राप्त वैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग का कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं है।

उन्होंने कहा कि इसी मामले से संबंधित विभागीय कार्यवाही में विस्तृत जांच के बाद याचिकाकर्ता को आरोपों से गुण-दोष के आधार पर मुक्त कर दिया गया था।

इस विभागीय जांच में चकबंदी अभिलेखों के साथ आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा एकत्र की गई सामग्री की भी जांच की गई थी।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं के अनुसार विभागीय कार्यवाही और आपराधिक मुकदमा, दोनों एक ही गांव में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान कथित अनियमितताओं से संबंधित हैं।

चकबंदी अधिनियम की धारा 49-A के तहत संरक्षण का दावा

याचिकाकर्ता ने उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 49-A के तहत भी कानूनी संरक्षण का दावा किया।

अधिवक्ता ने कहा कि जिस आदेश के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई, उसे उच्चतर अदालत पहले ही बरकरार रख चुकी है।

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इसके अलावा उन्होंने मामले में हुई देरी का भी मुद्दा उठाया।

उनका कहना था कि FIR वर्ष 2006 में दर्ज की गई थी, जबकि चार्जशीट लगभग 20 साल बाद 14 जनवरी 2026 को दाखिल की गई।

इन परिस्थितियों के आधार पर याचिकाकर्ता ने आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश को रद्द करने की मांग की।

राज्य सरकार ने राहत देने का विरोध किया

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता विश्वास सारस्वत ने आवेदन का विरोध किया।

उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं।

राज्य सरकार का कहना था कि याचिकाकर्ता को मुकदमे की सुनवाई के दौरान अपना बचाव करने का अवसर मिलेगा। इसलिए इस स्तर पर कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा, मामले पर विचार जरूरी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी ने कहा:

“इस मामले पर विचार किए जाने की आवश्यकता है।”

कोर्ट ने विपक्षी पक्ष संख्या 2 को नोटिस जारी करते हुए उसे शीघ्र वापसी योग्य बनाया।

साथ ही याचिकाकर्ता को नोटिस की तामील के लिए सात कार्य दिवसों के भीतर आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया।

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हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।

इसके बाद याचिकाकर्ता को प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मिलेगा।

अगली सुनवाई तक कठोर कार्रवाई नहीं होगी

हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया:

“अगली सूचीबद्ध तारीख तक संबंधित केस क्राइम और समन आदेश के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।”

इस आदेश के तहत राजेंद्र प्रसाद यादव को अगली सुनवाई तक संरक्षण मिला है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जवाबी और प्रत्युत्तर हलफनामे दाखिल करने के लिए निर्धारित समय समाप्त होने के बाद मामले को दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

फिलहाल हाईकोर्ट ने चार्जशीट या समन आदेश को रद्द नहीं किया है। इनकी वैधता पर आगे सुनवाई होगी।

केस डिटेल्स

केस का नाम: Rajendra Prasad Yadav vs. State of U.P. Thru. The Prin. Secy. Home Deptt. Lko. and Another

केस नंबर: Application U/S 528 BNSS No. 6714 of 2026

पीठ: जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी

आदेश की तारीख: 26 अक्टूबर 2026

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