सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखना केवल न्यायपालिका का दायित्व नहीं है, बल्कि यह सभी संवैधानिक संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि अन्य लोकतांत्रिक संस्थानों की प्रतिबद्धता पर संदेह करना या उन्हें कम आंकना उचित नहीं है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ गुरुवार को शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिकाएं उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट की ओर से दायर की गई हैं, जिनमें भारत निर्वाचन आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसके तहत एकनाथ शिंदे समूह को असली शिवसेना मानते हुए उसे ‘तीर-कमान’ प्रतीक आवंटित किया गया था।
विधानसभा अध्यक्षों के रुख पर कानूनी बहस
सुनवाई के दौरान उद्धव गुट का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने विधानसभा अध्यक्षों (स्पीकरों) द्वारा अयोग्यता याचिकाओं के निपटारे में होने वाली लगातार देरी का मुद्दा उठाया। सिब्बल ने तर्क दिया कि राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए इन मामलों को लटकाए रखते हैं, इसलिए संसद से इस संबंध में किसी सुधारात्मक कदम की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने पीठ से आग्रह किया कि सुप्रीम कोर्ट को ही इस विषय पर स्पष्ट दिशानिर्देश तय करने चाहिए।
इसके जवाब में जस्टिस बागची ने कहा कि लोकतंत्र के मूल्यों की रक्षा करना एक सामूहिक कर्तव्य है। वहीं, चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने कहा कि संसद के पास भी इस समस्या का समाधान निकालने का अधिकार है और अन्य संवैधानिक संस्थाएं भी अपने काम के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। सिब्बल ने इसके जवाब में कहा कि विधायिका भले ही कानून बनाती रहे, लेकिन संवैधानिक आदर्शों को अक्षुण्ण रखने का अंतिम मंच न्यायपालिका ही है।
निर्वाचन आयोग के अधिकारों को चुनौती
उद्धव गुट की ओर से चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत निर्वाचन आयोग द्वारा शक्तियों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए गए। सिब्बल ने कहा कि याचिका दायर होने के बाद घटी घटनाओं को आधार बनाकर पार्टी के स्वामित्व या अधिकार तय करना कानूनी दृष्टिकोण से सही नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई 18 अगस्त को करेगा।

