इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की एकलपीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवाद या आपसी कहासुनी के दौरान पत्नी को संतान न होने पर ताना मारना या ‘बांझ’ कहना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498-ए के तहत क्रूरता के कानूनी मानकों को पूरा नहीं करता है। कोर्ट ने माना कि दांपत्य जीवन में होने वाले मामूली मनमुटाव और अपशब्दों का आदान-प्रदान इस धारा के तहत आपराधिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता। इस निष्कर्ष के साथ हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 (अब बीएनएसएस की धारा 528) के तहत पति की याचिका स्वीकार करते हुए विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कस्टम), लखनऊ की अदालत में लंबित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही और 17 जनवरी 2023 के समनिंग आदेश को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक सरकारी डॉक्टर पति के खिलाफ उसकी पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई निजी शिकायत से शुरू हुआ था। दोनों का विवाह 14 दिसंबर 2015 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। शादी के तीन साल बाद भी संतान न होने पर दंपत्ति के बीच मनमुटाव बढ़ने लगा। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसकी सास उसे ‘बांझ’ कहकर ताने देती थी और जब उसने पति से डॉक्टरी जांच कराने को कहा, तो उसने जांच कराने से मना कर दिया तथा उल्टा अपने भाई से संबंध बनाने का सुझाव दिया।
शिकायत के अनुसार, 23 नवंबर 2020 की रात संतान न होने के मुद्दे पर हुई कहासुनी के दौरान महिला ने अपने पति को ‘नामर्द’ कह दिया। इसके बाद बहस बढ़ गई और पति, ससुर तथा देवर ने मिलकर उसके साथ मारपीट की। महिला का आरोप था कि पति ने उसे एक कमरे में बंद कर दिया, जहां ससुर और देवर ने उसके साथ बारी-बारी से दुष्कर्म किया। अगली सुबह सास द्वारा दरवाजा खोले जाने पर वह अपने मायके चली गई। डर, आघात और पिता की बीमारी का हवाला देते हुए वह कुछ समय तक शांत रही, लेकिन बाद में उसने 31 जुलाई 2021 को लखनऊ के गाजीपुर थाने में लिखित शिकायत दी। पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने पर उसने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसे मजिस्ट्रेट ने निजी शिकायत के रूप में दर्ज किया।
मजिस्ट्रेटी अदालत की कार्यवाही
विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कस्टम), लखनऊ ने सीआरपीसी की धारा 200 और 202 के तहत बयानों का अवलोकन करने के बाद 17 जनवरी 2023 को केवल पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए, 323, 504, 506 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत समन जारी किया, जबकि ससुर और देवर को समन जारी करने से इनकार कर दिया।
ससुराल पक्ष के अन्य सदस्यों को समन न भेजने के निर्णय में मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट के कहकशां कौसर बनाम बिहार राज्य मामले के निर्णय का संदर्भ दिया और टिप्पणी की थी: “सामान्य और सर्वव्यापी (ऑम्निबस) आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों को मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। स्पष्ट आरोपों के बिना ससुराल वालों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।” इसके बाद पति ने इस समनिंग आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
पक्षों की दलीलें
पति की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि शिकायत में लगाए गए आरोपों को यदि सत्य भी मान लिया जाए, तो भी वे कथित अपराधों की आवश्यक कानूनी सामग्री को पूरा नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि तीनों परिजनों पर केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए गए थे, ऐसे में केवल ‘पति’ होने के नाते उसे अलग से आरोपी बनाना अनुचित और भेदभावपूर्ण है। वकील ने कहा कि यह शिकायत केवल परेशान करने के उद्देश्य से की गई है और मजिस्ट्रेट ने बिना न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए समन जारी किया है।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता महिला के वकील ने तर्क दिया कि धारा 200 और 202 के बयानों में आपराधिक मामला चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश राज्य बनाम योगेंद्र सिंह जादौन व अन्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब आरोपों को मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध करने की आवश्यकता हो, तब धारा 482 के तहत हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष
शिकायत और गवाहों के बयानों का गहन विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि विवाद की मुख्य वजह शादी के बाद संतान का न होना थी, जिसके कारण दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस और गाली-गलौज हुई।
धारा 498-ए आईपीसी के तहत लगाए गए आरोप की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि घरेलू झगड़े के दौरान, जहां दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को अपशब्द कहे हों, पत्नी को ‘बांझ’ कहना ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण नहीं माना जा सकता जिसका उद्देश्य उसे आत्महत्या के लिए उकसाना या गंभीर शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुंचाना हो। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के निर्णय आंध्र प्रदेश राज्य बनाम कालिदिंडी सहदेवुडू व अन्य पर भरोसा जताया, जिसमें माना गया था कि “बच्चे न होने के आधार पर ताना मारना धारा 498-ए आईपीसी के तहत कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता” और “केवल संतान न होने के आधार पर टिप्पणी करना मृतक को धारा 498-ए आईपीसी के अर्थ में क्रूरता का शिकार बनाना नहीं है।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों—जैसे शोभित कुमार मित्तल बनाम यूपी राज्य, दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य, अभिषेक बनाम मध्य प्रदेश राज्य और प्रीति गुप्ता बनाम झारखंड राज्य—का उल्लेख करते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में आईपीसी की धारा 498-ए को व्यक्तिगत बदला लेने का जरिया बनाने की प्रवृत्ति के प्रति अदालतों को सजग रहना चाहिए। अचिन गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा: “हर वैवाहिक व्यवहार, जिससे दूसरे को झुंझलाहट हो सकती है, क्रूरता की श्रेणी में नहीं आ सकता। रोजमर्रा के शादीशुदा जिंदगी में होने वाले मामूली मनमुटाव और झगड़े भी क्रूरता नहीं माने जा सकते।”
धारा 504 आईपीसी (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) के संबंध में कोर्ट ने फियोना श्रीखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का हवाला दिया और निष्कर्ष निकाला कि बिना किसी पूर्व योजना या लोक शांति भंग करने के इरादे से घरेलू झगड़े में कहे गए अपशब्द इस धारा के तहत अपराध का गठन नहीं करते।
दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के आरोपों पर हाईकोर्ट ने पाया कि मूल शिकायत या धारा 156(3) के आवेदन में दहेज की मांग का कोई उल्लेख नहीं था। धारा 200 के बयान के अंत में दहेज की मांग का एक अस्पष्ट आरोप जोड़ा गया था, जबकि महिला की मां (पीडब्ल्यू-1) और भाई (पीडब्ल्यू-2) ने अपने बयानों में ऐसी किसी मांग की बात नहीं कही। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने दहेज कानून के तहत समन जारी करने में अपने अधिकारों का यांत्रिक रूप से प्रयोग किया।
धारा 323 और 506 आईपीसी के संबंध में कोर्ट ने अभिषेक सक्सेना बनाम यूपी राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि मारपीट के आरोप अस्पष्ट थे और किसी भी मेडिकल रिपोर्ट या चोट के साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं थे। इसके अलावा, जब तीनों अभियुक्तों पर मारपीट के एक जैसे आरोप थे, तो मजिस्ट्रेट ने बिना किसी तार्किक कारण के केवल पति को ही समन जारी किया।
धारा 482 सीआरपीसी के तहत अंतर्निहित शक्तियों के दायरे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल, कृष्णा लाल चावला बनाम यूपी राज्य, पेप्सी फूड्स लिमिटेड बनाम स्पेशल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, चंद्र देव सिंह बनाम प्रकाश चंद्र बोस, महमूद अली बनाम यूपी राज्य और मोहम्मद वाजिद बनाम यूपी राज्य जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का जिक्र किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे केवल शिकायत की भाषा तक सीमित न रहें, बल्कि परिस्थितियों का व्यापक मूल्यांकन करके दुर्भावनापूर्ण मुकदमों को खारिज करें। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि पति और सास की उपस्थिति में ससुर और देवर द्वारा दुष्कर्म किए जाने का दावा स्वाभाविक रूप से अविश्वसनीय प्रतीत होता है।
कोर्ट का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। तदनुसार, हाईकोर्ट ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका स्वीकार करते हुए 17 जनवरी 2023 के समनिंग आदेश को रद्द कर दिया और शिकायत केस संख्या 96681/2021 की संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: हिरेंद्र कुशवाहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव गृह विभाग, लखनऊ व अन्य
वाद संख्या: एप्लीकेशन यू/एस 482 नं. 10841 ऑफ 2025
पीठ: जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला
निर्णय की तिथि: 13.08.2026

