मादक पदार्थ कानून के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं के पालन को लेकर एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस एक्ट) के तहत जब्त किए गए नशीले पदार्थ की सैंपलिंग, जांच और निपटान में प्रक्रियात्मक नियमों का उल्लंघन हिरासत को अमान्य कर देता है। दो संबद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं (हेबियस कॉर्पस रिट पिटीशन) पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की डिवीजन बेंच ने माना कि याचिकाकर्ताओं की हिरासत कानून के दायरे से बाहर थी। पीठ ने दोनों आरोपियों को तत्काल जेल से रिहा करने का आदेश देते हुए कहा कि 2022 के एनडीपीएस नियमों के तहत दिए गए वैधानिक सुरक्षा उपाय अनिवार्य हैं और उनका उल्लंघन ऐसा दोष है जिसे बाद में सुधारा नहीं जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 25 अक्टूबर 2024 को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) द्वारा गौतम बुद्ध नगर के कासना औद्योगिक क्षेत्र स्थित जे-36, साइट V यूपीएसआईडीसी के परिसर में मारे गए छापे से जुड़ा है। तलाशी के दौरान एनसीबी ने मौके पर ड्रग डिटेक्शन (डीडी) किट के जरिए 95.501 किलोग्राम प्रतिबंधित पदार्थ को ‘मेथाम्फेटामाइन’ (आइस) के रूप में चिन्हित कर जब्त किया था और पंचनामा तैयार कर अपराध संख्या VIII/35/DZU/2024 दर्ज की थी।
इसके बाद 26 अक्टूबर 2024 को याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और उन्हें एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत नोटिस दिया गया। 27 अक्टूबर 2024 को रिमांड मजिस्ट्रेट ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। एनसीबी ने 28 अक्टूबर 2024 को एनडीपीएस एक्ट की धारा 52-ए(2) के तहत जब्त माल के न्यायिक प्रमाणीकरण के लिए अर्जी दाखिल की। यह अर्जी अदालत में 6 महीने और 8 दिन तक लंबित रही, जिसे अंततः अदालत ने 26 अप्रैल 2025 को स्वीकार किया।
एनडीपीएस एक्ट की धारा 36-ए(4) के तहत चार्जशीट या शिकायत दर्ज करने की 180 दिनों की अवधि 23 अप्रैल 2025 को समाप्त हो रही थी। विशेष अदालत ने 19 अप्रैल 2025 को एनसीबी की अर्जी पर जांच पूरी करने के लिए 60 दिनों का अतिरिक्त समय दे दिया था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इस समय-विस्तार आदेश को हाईकोर्ट में धारा 482 की याचिका के जरिए चुनौती दी, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 26 अगस्त 2025 को विशेष अदालत का वह आदेश रद्द कर दिया और एनसीबी को नई अर्जी देने की छूट दी। लेकिन एनसीबी ने कोई नई अर्जी दाखिल नहीं की और न ही अदालत ने समय बढ़ाने का कोई नया आदेश पारित किया। इसके बावजूद एनसीबी ने 20 जून 2025 को शिकायत दाखिल की, जिस पर ट्रायल कोर्ट ने 25 जून 2025 को संज्ञान ले लिया।
उधर, 29 अप्रैल 2025 को फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) भेजे गए नमूनों का केवल गुणात्मक परीक्षण (क्वालिटेटिव टेस्ट) 19 जून 2025 को किया गया, जिसमें पदार्थ ‘मेफेड्रोन’ पाया गया, जबकि छापे के समय डीडी किट ने इसे ‘एम्फेटामाइन’ बताया था। एफएसएल द्वारा शुद्ध नशीले पदार्थ की मात्रा जांचने के लिए कोई मात्रात्मक विश्लेषण (क्वांटिटेटिव टेस्ट) नहीं किया गया और बाद में जब्त किए गए मुख्य माल को भी नष्ट कर दिया गया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हिरासत को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों के तर्क
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एनडीपीएस (जब्ती, भंडारण, सैंपलिंग और निपटान) नियम, 2022 के नियम 14 के तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों परीक्षण कराना अनिवार्य है। मात्रात्मक परीक्षण रिपोर्ट के अभाव में एनसीबी द्वारा दाखिल शिकायत अधूरी थी और उस पर अदालत द्वारा संज्ञान लिया जाना अवैध था। अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने भरत चौधरी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, अजीत सिंह उर्फ जीता बनाम पंजाब राज्य, और सुनील वसंतराव फुलबंदे बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसलों पर भरोसा जताया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि जब्त माल को एनडीपीएस एक्ट की धारा 52-ए के तहत सक्षम अदालत से कोई पूर्व आदेश लिए बिना और आरोपियों को कोई नोटिस दिए बिना नष्ट कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जरूपाराम के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा करने से बचाव पक्ष को अपूरणीय क्षति पहुंचती है और पूरी कानूनी प्रक्रिया दूषित हो जाती है। इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट द्वारा जांच की अवधि बढ़ाने वाले आदेश को रद्द किए जाने और कोई नया आदेश न होने के कारण उनकी निरंतर हिरासत को अधिकृत करने वाला कोई कानूनी रिमांड आदेश अस्तित्व में नहीं था।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और एनसीबी के वकीलों ने याचिकाओं का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास से व्यावसायिक मात्रा (कमर्शियल क्वांटिटी) में नशीला पदार्थ बरामद हुआ था और गिरफ्तारी के आधार भी विधिवत बताए गए थे। एनसीबी ने दलील दी कि केवल मात्रात्मक विश्लेषण पर विवाद होने से शिकायत दोषपूर्ण नहीं हो जाती और वैज्ञानिक साक्ष्यों व नमूनों की विसंगतियों का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान ही किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के हीरा सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2020) फैसले का हवाला देते हुए एजेंसी ने कहा कि यदि नशीला पदार्थ किसी तटस्थ पदार्थ के साथ मिला हो, तो व्यावसायिक मात्रा तय करने के लिए पूरे मिश्रण का वजन देखा जाता है, न कि केवल शुद्ध नशीले तत्व की मात्रा। एनसीबी ने भरत आंबले बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो बनाम काशिफ, और जोथी उर्फ नागजोथी बनाम राज्य के निर्णयों का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि माल के निपटान में प्रक्रियात्मक त्रुटियों से ट्रायल स्वतः समाप्त नहीं होता और न ही आरोपी रिहाई का हकदार बनता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
डिवीजन बेंच ने पाया कि एनसीबी ऐसा कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि जब्त माल को नष्ट करने से पहले एनडीपीएस एक्ट की धारा 52-ए के तहत अदालत से कोई पूर्व आदेश लिया गया था या आरोपियों को कोई नोटिस दिया गया था। अदालत ने रेखांकित किया कि चूंकि भौतिक रूप से मौजूद पूरे माल को बिना कानूनी अनुमति के पहले ही नष्ट कर दिया गया, इसलिए अब भविष्य में उसका मात्रात्मक विश्लेषण किया जाना असंभव है, जो अभियोजन पक्ष के मामले में एक ऐसा दोष बन चुका है जिसे कभी सुधारा नहीं जा सकता।
एनसीबी द्वारा हीरा सिंह फैसले पर दिए गए जोर का जवाब देते हुए हाईकोर्ट ने 2020 के उस फैसले के बाद हुए विधायी बदलावों को रेखांकित किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने 23 दिसंबर 2022 को एनडीपीएस (जब्ती, भंडारण, सैंपलिंग और निपटान) नियम, 2022 अधिसूचित किए हैं:
“उक्त नियमों के नियम 14 के लागू होने से सुप्रीम कोर्ट के हीरा सिंह (उपरोक्त) मामले के फैसले का प्रभाव कम हो जाता है। उक्त नियमों के नियम 13 और 14 को ध्यान में रखते हुए हीरा सिंह (उपरोक्त) मामले का पालन नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह नियम 2022 का बाद का नियम है और इसकी वैधता को अभी तक चुनौती नहीं दी गई है।”
अदालत ने पाया कि नियम 14 यह अनिवार्य करता है कि यदि मात्रात्मक विश्लेषण में 15 दिनों से अधिक समय लगता है, तो गुणात्मक परिणाम तय समय में भेजे जाने चाहिए और उसके अगले 15 दिनों के भीतर मात्रात्मक परीक्षण के नतीजे भी दिए जाने चाहिए। वर्तमान मामले में ऐसा कोई मात्रात्मक परीक्षण कभी कराया ही नहीं गया। हाईकोर्ट ने नशीले पदार्थ की पहचान में आए बुनियादी विरोधाभास पर भी सवाल उठाया कि मौके पर किट जांच में ‘एम्फेटामाइन’ मिला था, जबकि प्रयोगशाला जांच में ‘मेफेड्रोन’ निकला। इसके अलावा, नियम 13 के विपरीत नमूनों को मजिस्ट्रेट के जरिए भेजने के बजाय सीधे एनसीबी अधिकारियों द्वारा प्रयोगशाला भेजा गया, जिससे नमूनों की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 52-ए(2) के तहत प्रमाणीकरण की अर्जी 6 महीने से अधिक समय तक अदालत में लंबित रही, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे पता चले कि उस पूरी अवधि में नमूने कहां रखे गए थे और क्या उनकी सुरक्षित अभिरक्षा प्रमाणित की गई थी।
हिरासत की वैधता पर अदालत ने कहा कि धारा 36-ए(4) के तहत जांच अवधि बढ़ाने का जो आदेश था, उसे हाईकोर्ट ने 26 अगस्त 2025 को ही निरस्त कर दिया था। चूंकि एनसीबी ने न तो कोई नई अर्जी दी और न ही अदालत ने समय बढ़ाया, इसलिए 20 जून 2025 को दाखिल की गई शिकायत समय-बाधित थी। एनसीबी बनाम काशिफ मामले को अलग बताते हुए अदालत ने कहा कि नियम 13 और 14 की अनिवार्य योजना की अवहेलना अभियोजन के लिए घातक है।
अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा:
“इसलिए इस मामले की समग्रता और तथ्यों व परिस्थितियों के तहत, हम पाते हैं कि 26.10.2024 को गिरफ्तारी के बाद से प्रतिवादियों द्वारा याचिकाकर्ताओं को हिरासत में रखना कानून की अनुमति के बिना है।”
“एनसीबी द्वारा कानून का बार-बार उल्लंघन किया गया है, जो याचिकाकर्ताओं के रिकॉर्ड पर लाई गई सामग्री से साबित होता है।”
नारकोटिक्स कानून के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए पीठ ने कहा:
“यह स्थापित कानून है कि एनडीपीएस एक्ट के तहत सख्त प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन किया जाना आवश्यक है, और ऐसा न करने पर आरोपी जमानत या बरी होने का हकदार होगा।”
अदालत का निर्णय
इन वैधानिक उल्लंघनों के आधार पर हिरासत को गैरकानूनी करार देते हुए हाईकोर्ट ने दोनों बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और याचिकाकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया:
“एनसीबी द्वारा याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी और जेल में उनका निरोध अवैध ठहराया जाता है। उन्हें संबंधित अदालत की संतुष्टि के अनुसार 2 लाख रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और इतनी ही राशि की दो जमानतें प्रस्तुत करने पर तत्काल जेल से रिहा करने का निर्देश दिया जाता है।”
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अमित सिंह एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं 2 अन्य (संबद्ध मामले के साथ)
वाद संख्या: बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका संख्या 582/2026 (संबद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका संख्या 686/2026 के साथ)
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 28 सितंबर, 2026

