सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देश भर के स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी शिक्षण संस्थानों में रैगिंग और बुलिंग की रोकथाम के लिए केंद्रीय कानून और एक समान दिशा-निर्देश लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत इस विषय से जुड़े मुद्दों पर पहले ही फैसला सुना चुकी है। पीठ ने कहा कि पहले जारी किए गए अदालती निर्देशों के क्रियान्वयन के लिए कोई नई याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष प्रतिवेदन देने की अनुमति
पीठ ने याचिका पर आगे सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता यादवी आदित्य रसिवासिया के वकील को इस संबंध में संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष अपना प्रतिवेदन (रिप्रेजेंटेशन) पेश करने की अनुमति दे दी।
इस याचिका में केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) और काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (सीआईएससीई) को पक्षकार बनाया गया था।
केंद्रीय कानून और अनिवार्य पाठ्यक्रम की मांग
याचिका में अदालत से परमादेश (रिट ऑफ मैंडमस) जारी करने का आग्रह किया गया था, जिससे संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों को स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी संस्थानों में रैगिंग और बुलिंग की समस्या पर लगाम लगाने के लिए एक उपयुक्त केंद्रीय कानून बनाने और उसे लागू करने का निर्देश दिया जा सके।
इसके अलावा, याचिका में प्रस्तावित केंद्रीय कानून के तहत पूरक दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी, जिन्हें सभी स्कूल और प्री-यूनिवर्सिटी संस्थान अनिवार्य रूप से लागू करें ताकि छात्रों से जुड़ी शिकायतों का समयबद्ध और प्रभावी निस्तारण सुनिश्चित हो सके। साथ ही, याचिकाकर्ता ने सभी केंद्रीय और राज्य शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम में रैगिंग और बुलिंग के दुष्प्रभावों पर आधारित एक विषय को अनिवार्य रूप से शामिल करने का निर्देश देने की अपील की थी।

