MACT मामलों में आईटीआर से आय का आकलन करने का कोई तय फॉर्मूला नहीं; व्यवसाय की प्रकृति और विकास पर भी ध्यान देना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सड़क दुर्घटना मुआवजा दावों के मामलों में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों की वार्षिक आय का आकलन करने के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (आईटीआर) के उपयोग पर नए मार्गदर्शक सिद्धांत स्पष्ट किए हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत आय की गणना के लिए कोई एक समान या कड़ा नियम नहीं अपनाया जा सकता। देश की विभिन्न निचली अदालतों में इस विषय पर चल रहे अलग-अलग तरीकों को दूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां वेतनभोगी लोगों के लिए केवल पिछले एक साल का आईटीआर ही उनकी आय तय करने के लिए पर्याप्त है, वहीं स्व-नियोजित या व्यवसायी व्यक्तियों के मामले में पिछले तीन वर्षों तक के आईटीआर का औसत देखा जाना चाहिए। इसके साथ ही उनके व्यवसाय की प्रकृति, भविष्य में विस्तार की संभावना और विकास के पैटर्न पर भी विचार करना आवश्यक है। इन दिशानिर्देशों को तीन अलग-अलग अपीलों पर लागू करते हुए कोर्ट ने उड़ीसा और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसलों में बदलाव किया और पीड़ितों के परिवारों को मिलने वाले मुआवजे में बड़ी बढ़ोतरी की।

मामलों की पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश तीन अलग-अलग सड़क दुर्घटना मामलों की संयुक्त सुनवाई के दौरान जारी किए, जिनमें पीड़ितों के परिवारों ने निचली अदालतों द्वारा आय की गणना के तरीकों को चुनौती दी थी:

  1. कंस्ट्रक्शन व्यवसायी का मामला (रश्मिरेखा त्रिपाठी बनाम श्रीराम जनरल इंश्योरेंस): 29 मई 2018 को 39 वर्षीय मनोरंजन पांडे की कार को राष्ट्रीय राजमार्ग पर कालियाबली चक्का के पास एक तेज रफ्तार ट्रक ने टक्कर मार दी थी, जिससे उनकी मौत हो गई। वह कंस्ट्रक्शन का व्यवसाय चलाते थे। बेहरामपुर के मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (एमएसीटी) ने उनके असेसमेंट ईयर 2018-19 के आईटीआर के आधार पर उनकी वार्षिक आय 15 लाख रुपये मानी और उनके परिवार को 2,27,00,064 रुपये का मुआवजा दिया। हालांकि, उड़ीसा हाईकोर्ट ने पिछले दो वर्षों के आईटीआर का औसत निकालकर उनकी वार्षिक आय को घटाकर 13,33,226 रुपये कर दिया और गुणक (मल्टीप्लायर) को भी 16 से घटाकर 15 कर दिया, जिससे मुआवजा घटकर 1,87,75,150 रुपये रह गया।
  2. इंश्योरेंस एजेंट का मामला (रजनी बनाम मुकेश): 8 जनवरी 2017 को 49 वर्षीय सुशील, जो एक इंश्योरेंस एजेंट थे, की कार को एक डम्पर ने टक्कर मार दी और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। मनावर एमएसीटी ने उनके परिवार को 49,77,000 रुपये का मुआवजा दिया, जिसे बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने बढ़ाकर 76,09,500 रुपये कर दिया। हाईकोर्ट ने उनके पिछले चार वर्षों के आईटीआर का औसत निकालकर उनकी मासिक आय 62,500 रुपये तय की थी।
  3. किराना व्यापारी का मामला (श्रीमती रेखा बनाम दिनेश पोरवाल): 15 जून 2015 को थोक किराना दुकान चलाने वाले 28 वर्षीय कृष्णवल्लभ की मोटरसाइकिल को एक तेज रफ्तार वाहन ने टक्कर मार दी, जिससे इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। मंदसौर एमएसीटी ने उनकी मासिक आय केवल 7,000 रुपये मानते हुए 15,36,560 रुपये का मुआवजा दिया था। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने उनके दो वर्षों (असेसमेंट ईयर 2012-13 और 2013-14) के आईटीआर का औसत निकालकर मुआवजे को बढ़ाकर 38,40,850 रुपये कर दिया। हाईकोर्ट ने मौत के बाद दाखिल किए गए दो आईटीआर को इस गणना से बाहर रखा था।
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अदालत में दी गई दलीलें और विशेषज्ञों की राय

आईटीआर आधारित आय के आकलन को लेकर विभिन्न हाईकोर्ट्स के बीच एकरूपता की कमी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील जे.आर. मिड्ढा और वकील सलिल पॉल को इस मामले में सहयोग करने के लिए ‘एमिसी क्यूरी’ (अदालत का मित्र) नियुक्त किया था।

वरिष्ठ वकील जे.आर. मिड्ढा ने कोर्ट को बताया कि कुछ अदालतें मुआवजे के लिए पिछले तीन साल की आय का औसत लेती हैं, जबकि कुछ केवल आखिरी रिटर्न पर भरोसा करती हैं। उन्होंने जोर दिया कि हालांकि आईटीआर प्राथमिक साक्ष्य है, लेकिन यह हमेशा व्यवसाय की वास्तविक वित्तीय स्थिति को नहीं दर्शाता; विशेषकर उन व्यवसायों में जहां शुरुआती वर्षों में घाटा होता है या आय में उतार-चढ़ाव रहता है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि कोई आईटीआर मौत के बाद दाखिल किया गया हो, तो अदालतों को तीन साल के आईटीआर के साथ-साथ संबंधित व्यवसाय की बैलेंस शीट की भी जांच करनी चाहिए। वहीं, वकील सलिल पॉल ने आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम अजय कुमार मोहंती (2018) मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने तीन साल के आईटीआर के औसत को आधार बनाया था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और नए दिशानिर्देश

अपना फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल ने दोहराया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 का मूल उद्देश्य पीड़ितों को ‘निष्पक्ष और उचित मुआवजा’ दिलाना है। हाल ही के एक फैसले (वी. पद्मवती बनाम भारती एक्सा जनरल इंश्योरेंस, 2026) का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“कोई भी राशि इस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती। मुआवजा और कुछ नहीं बल्कि एक मोटा अनुमान है, जो आश्रितों पर वित्तीय बोझ को कम करने का एक सांकेतिक प्रयास है।”

पीठ ने आगे कहा:

“मृतक की आय, उसके आश्रितों की आवश्यकताओं और नुकसान के भावनात्मक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, सबसे बेहतर यही सुनिश्चित किया जा सकता है कि मुआवजा निष्पक्ष और तर्कसंगत हो, न कि मनमाना या अत्यंत कम।”

इसके साथ ही रेशमा कुमारी बनाम मदन मोहन (2013) मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

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“मुआवजे का उद्देश्य सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के पीड़ित आश्रितों को वित्तीय रूप से लगभग उसी स्थिति में लाना है, जिसमें वे तब होते यदि मृतक अपनी पूरी प्राकृतिक जिंदगी जीता।”

अनंत बनाम प्रताप (2018) मामले का हवाला देते हुए भी कोर्ट ने दोहराया कि:

“मुआवजे का उद्देश्य पीड़ित पक्ष को दुर्घटना से पहले की स्थिति में पूरी तरह और पर्याप्त रूप से वापस लाना है।”

इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि मृतक या दावेदार की वार्षिक आय की गणना करने का “कोई तय फॉर्मूला नहीं हो सकता”। कोर्ट ने आय के आकलन के लिए दो श्रेणियों में स्पष्ट अंतर तय किया:

  • वेतनभोगी व्यक्तियों के लिए: केवल पिछले वर्ष का आईटीआर ही वार्षिक आय साबित करने के लिए पर्याप्त है। बहुत पुराने रिकॉर्ड देखने से हाल ही में मिली पदोन्नति (प्रमोशन) का प्रभाव अनदेखा हो जाता है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु पदोन्नति के तुरंत बाद और नया रिटर्न दाखिल करने से पहले हो जाती है, तो अदालतें प्रमोशन लेटर और अन्य वित्तीय दस्तावेजों पर भरोसा कर सकती हैं।
  • स्व-नियोजित या व्यवसायी व्यक्तियों के लिए: पिछले तीन वर्षों तक के आईटीआर में दिखाई गई औसत आय को ही मुख्य आधार माना जाना चाहिए। यदि तीन से कम वर्षों के रिटर्न उपलब्ध हों, तो अदालतों को अन्य परिस्थितियों को देखना चाहिए। इनमें व्यवसाय की प्रकृति, स्थान, भविष्य में विकास की संभावनाएं, शुरुआती वर्षों में होने वाले नुकसान और इस बात की जांच शामिल है कि कहीं मौत के बाद तो आईटीआर दाखिल करके आय को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संशोधित मुआवजे की गणना

इन नए सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीनों अपीलों को स्वीकार कर लिया और पीड़ितों के परिवारों के लिए मुआवजे की राशि को बढ़ा दिया:

पहला मामला: रश्मिरेखा त्रिपाठी बनाम श्रीराम जनरल इंश्योरेंस

कोर्ट ने माना कि मृतक कंस्ट्रक्शन व्यवसाय में थे, इसलिए वे स्व-नियोजित श्रेणी में आते हैं। उनके व्यवसाय की प्रकृति को देखते हुए कोर्ट ने उनकी वार्षिक आय 14,00,000 रुपये तय की और कुल मुआवजा बढ़ाकर 1,97,81,505 रुपये कर दिया।

मुआवजे की नई गणना:

  • वार्षिक आय: 14,00,000 रुपये
  • भविष्य की संभावनाएं (40% बढ़ोतरी): 14,00,000 रुपये + 5,60,000 रुपये = 19,60,000 रुपये (प्रणय सेठी मामले के अनुसार)
  • आश्रितों के लिए कटौती (1/3 हिस्सा): 19,60,000 रुपये – 6,53,333 रुपये = 13,06,667 रुपये
  • आय का नुकसान (15 का गुणक): 13,06,667 रुपये गुणा 15 = 1,96,00,005 रुपये
  • संपत्ति का नुकसान (10% बढ़ोतरी के साथ): 18,150 रुपये
  • अंतिम संस्कार का खर्च (10% बढ़ोतरी के साथ): 18,150 रुपये
  • पारिवारिक संगति/कंसोर्टियम का नुकसान (3 आश्रितों के लिए): 1,45,200 रुपये (सतिंदर कौर और राजवती उर्फ रज्जो मामलों के अनुसार)
  • कुल संशोधित मुआवजा: 1,97,81,505 रुपये (हाईकोर्ट के आदेश से 10,06,355 रुपये अधिक)
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दूसरा मामला: रजनी और अन्य बनाम मुकेश और अन्य

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने एक इंश्योरेंस एजेंट के लिए चार साल के आईटीआर का औसत निकालकर गलती की थी, क्योंकि कमीशन पर आधारित काम में उतार-चढ़ाव होना स्वाभाविक है और इसके लिए बहुत पुराने रिटर्न देखना सही नहीं है। पिछले तीन वर्षों के आईटीआर का औसत 6,87,802 रुपये निकला, जिसके आधार पर मुआवजे को बढ़ाकर 87,09,282 रुपये किया गया।

मुआवजे की नई गणना:

  • वार्षिक आय: 6,87,802 रुपये
  • भविष्य की संभावनाएं (25% बढ़ोतरी): 6,87,802 रुपये + 1,71,950 रुपये = 8,59,752 रुपये
  • कटौती (1/4 हिस्सा): 8,59,752 रुपये – 2,14,938 रुपये = 6,44,824 रुपये
  • आय का नुकसान (13 का गुणक): 6,44,824 रुपये गुणा 13 = 83,82,582 रुपये
  • संपत्ति का नुकसान: 18,150 रुपये
  • अंतिम संस्कार का खर्च: 18,150 रुपये
  • कंसोर्टियम का नुकसान (6 आश्रितों के लिए): 2,90,400 रुपये
  • कुल संशोधित मुआवजा: 87,09,282 रुपये (हाईकोर्ट के आदेश से 11,00,000 रुपये अधिक)

तीसरा मामला: श्रीमती रेखा और अन्य बनाम दिनेश पोरवाल और अन्य

इस मामले में दावेदारों ने मृतक की मृत्यु के बाद दो वर्षों के आईटीआर दाखिल किए थे, जिनमें आय में अचानक बड़ी बढ़ोतरी दिखाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि बिना अतिरिक्त वित्तीय दस्तावेजों के यह जांचना संभव नहीं है कि क्या यह आय बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई थी। मामले को वापस निचली अदालत भेजने में होने वाली देरी से बचने के लिए, कोर्ट ने न्याय हित में मृतक की वार्षिक आय को 3,25,000 रुपये तय किया और कुल मुआवजा बढ़ाकर 60,79,550 रुपये कर दिया।

मुआवजे की नई गणना:

  • वार्षिक आय: 3,25,000 रुपये
  • भविष्य की संभावनाएं (40% बढ़ोतरी): 3,25,000 रुपये + 1,30,000 रुपये = 4,55,000 रुपये
  • कटौती (1/4 हिस्सा): 4,55,000 रुपये – 1,13,750 रुपये = 3,41,250 रुपये
  • आय का नुकसान (17 का गुणक): 3,41,250 रुपये गुणा 17 = 58,01,250 रुपये
  • संपत्ति का नुकसान: 18,150 रुपये
  • अंतिम संस्कार का खर्च: 18,150 रुपये
  • कंसोर्टियम का नुकसान (5 आश्रितों के लिए): 2,42,000 रुपये
  • कुल संशोधित मुआवजा: 60,79,550 रुपये (हाईकोर्ट के आदेश से 22,38,700 रुपये अधिक)

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रश्मिरेखा त्रिपाठी और अन्य बनाम शाखा प्रबंधक (कानूनी दावे), श्रीराम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य; रजनी और अन्य बनाम मुकेश और अन्य; श्रीमती रेखा और अन्य बनाम दिनेश पोरवाल और अन्य

वाद संख्या: सिविल अपील जो 2024 की एसएलपी (सिविल) संख्या 27220 से उत्पन्न हुई; सिविल अपील जो 2025 की एसएलपी (सिविल) संख्या 3088 से उत्पन्न हुई; सिविल अपील जो 2025 की एसएलपी (सिविल) संख्या 7735 से उत्पन्न हुई

पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह

निर्णय की तिथि: 1 जुलाई, 2026

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