माता-पिता के विवाद में फंसे वयस्क के यात्रा अधिकार बहाल, कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी वयस्क व्यक्ति को उसके माता-पिता की कस्टडी में नहीं रखा जा सकता और न ही उसे उनके वैवाहिक विवादों में घसीटा जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बालिग होने के बाद हर नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्र रूप से यात्रा करने का मौलिक अधिकार है।

जस्टिस सूरज गोविंदराज ने 1 जुलाई को यह आदेश जारी करते हुए ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन को निर्देश दिया कि वह अनुराग सेठ नाम के व्यक्ति के खिलाफ जारी लुकआउट सर्कुलर और यात्रा प्रतिबंधों को तुरंत हटाए। अनुराग की उम्र अब 30 वर्ष हो चुकी है, लेकिन उनके माता-पिता के बीच चल रहे एक पुराने विवाद के कारण उनके खिलाफ साल 2006 से यह प्रतिबंध लागू था।

यह मामला तब सामने आया जब 2024 में अनुराग ने विदेश यात्रा करने की कोशिश की। उस समय इमिग्रेशन अधिकारियों ने उन्हें बताया कि वह देश से बाहर नहीं जा सकते क्योंकि उनके नाम पर 2006 का एक लुकआउट सर्कुलर अभी भी सक्रिय है। यह सर्कुलर मध्य प्रदेश के इंदौर की एक फैमिली कोर्ट द्वारा 17 मार्च 2006 को जारी अंतरिम आदेश के आधार पर लगाया गया था।

यात्रा प्रतिबंध की वजह क्या थी

यह पूरा मामला अनुराग के माता-पिता के बीच तलाक और बच्चों की कस्टडी के मुकदमे से जुड़ा है। उस दौरान अनुराग के पिता ने फैमिली कोर्ट में एक अर्जी दी थी, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि कानूनी कार्यवाही लंबित रहने तक मां को बच्चों को भारत से बाहर ले जाने से रोका जाए।

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इस पर सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित किया था। कोर्ट ने मां पर पाबंदी लगाई थी कि वह अदालत की अनुमति के बिना नाबालिग बच्चों को न तो खुद विदेश ले जा सकती हैं और न ही किसी अन्य व्यक्ति के जरिए भेज सकती हैं। इसी आदेश को आधार बनाकर साल 2006 में लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया था, जो तब से लगातार लागू रहा।

अनुराग ने इस प्रतिबंध को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका तर्क था कि बचपन में माता-पिता के कस्टडी विवाद के दौरान उन पर लगाई गई पाबंदी बालिग होने के बाद जारी नहीं रह सकती। उन्होंने अदालत को बताया कि वह करीब 14 साल पहले ही बालिग हो चुके हैं, इसलिए इस लुकआउट सर्कुलर को बहुत पहले ही वापस ले लिया जाना चाहिए था।

हाईकोर्ट का रुख और अंतिम फैसला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को सही माना। अदालत ने कहा कि जैसे ही याचिकाकर्ता बालिग हुआ, फैमिली कोर्ट का वह अंतरिम आदेश अपने आप बेअसर हो गया। अदालत ने साफ किया कि बचपन के कस्टडी विवाद में दिए गए अंतरिम आदेश और बालिग होने के बाद किसी व्यक्ति के यात्रा के अधिकार, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं और इन्हें आपस में मिलाया नहीं जा सकता।

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हाईकोर्ट ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि इंदौर की फैमिली कोर्ट को पहले ही सूचित किया जा चुका था कि बच्चे बालिग हो चुके हैं। इसके आधार पर पिता को बच्चों की सुरक्षात्मक कस्टडी से मुक्त कर दिया गया था और साल 2023 में मूल याचिका को पूरी तरह निपटा दिया गया था।

जस्टिस गोविंदराज ने अपने फैसले में कहा कि साल 2006 में लुकआउट सर्कुलर को निरस्त न करने के लिए अधिकारियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन जब यह मामला उनके संज्ञान में लाया गया, तो ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन को इसे तुरंत रद्द कर देना चाहिए था। अधिकारियों द्वारा ऐसा न किए जाने के कारण हाईकोर्ट ने अनुराग के पक्ष में फैसला सुनाया और उनके यात्रा प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाने का आदेश दिया।

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