कर्नाटक हाईकोर्ट ने अमेरिकी मिशनरी संस्था से जुड़े माओवादी फंडिंग मामले में जांच रोकने से किया इनकार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने अमेरिकी मिशनरी संस्था ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) से जुड़े एक संदिग्ध माओवादी फंडिंग मामले में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने बेंगलुरु के रहने वाले आरोपी मीका मार्क की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जांच पर रोक लगाने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट के जस्टिस एम नागप्रसन्न ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की आर्थिक स्थिरता से जुड़े इस गंभीर मामले में शुरुआती चरण पर कोई भी अदालती हस्तक्षेप ठीक नहीं है और मामले की पूरी जांच होना बेहद जरूरी है।

पुलिस ने यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शिकायत पर बेंगलुरु के कोथानूर थाने में दर्ज किया था। आरोपियों पर अमेरिकी बैंक द्वारा जारी किए गए विदेशी डेबिट कार्डों के जरिए लगभग 100 करोड़ रुपये (92.55 करोड़ रुपये या लगभग 99.95 लाख डॉलर) अवैध रूप से निकालने और इस पैसे का इस्तेमाल भारत के विभिन्न हिस्सों में माओवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए करने का आरोप है।

इस मामले में याचिकाकर्ता मीका मार्क (43) के अलावा बेंगलुरु के ही जोनाथन सुशील राजन (50) और अजीत वर्गीज मथाई (55), मैसूरु के सुप्रीम जॉय (34), छत्तीसगढ़ के धमतरी निवासी वर्गीज चाको (58) और असम के गोलपारा निवासी बबलू कुर्मी (35) को आरोपी बनाया गया है।

फर्जी नामों से बांटे गए थे एक हजार से ज्यादा एटीएम कार्ड

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शिकायत के अनुसार, आयकर विभाग और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत 18 और 19 अप्रैल को की गई छापेमारी के दौरान इस वित्तीय नेटवर्क का खुलासा हुआ था। मुख्य आरोपी मीका मार्क को 18 अप्रैल को बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया था, जिसके पास से सुरक्षा एजेंसियों को 24 विदेशी डेबिट कार्ड मिले थे। जांच में यह भी सामने आया कि इसी तरह के 1,000 से अधिक कार्ड पूरे देश में बांटे गए थे, जिनमें से कई कार्डों पर ‘संतोष कुमार’ नाम दर्ज था और उन पर “NE-1”, “NE-2” और “Southern Region-1” जैसे क्षेत्रीय कोड लिखे हुए थे।

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आरोप है कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच महज छह महीने की अवधि में इन विदेशी कार्डों से भारी-भरकम राशि निकाली गई, जो फेमा (FEMA) और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के नियमों का सीधा उल्लंघन है। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों के दौरान छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतरी जैसे धुर माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में इन खातों से करीब 6.34 करोड़ रुपये की संदिग्ध नकदी निकाली गई।

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऑक्सीजन है अवैध फंडिंग: हाईकोर्ट

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याचिका खारिज करते हुए जस्टिस एम नागप्रसन्न ने टिप्पणी की कि वर्तमान समय में देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक चरमपंथ को मिलने वाली गुप्त फंडिंग है। उन्होंने कहा कि यह फंडिंग ही वह ‘ऑक्सीजन’ है जो उग्रवादी आंदोलनों को जिंदा रखने और उन्हें फैलने में मदद करती है। कोर्ट ने सचेत किया कि यदि इस तरह की अवैध फंडिंग को अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो वैचारिक कट्टरता संगठित हिंसा का रूप ले लेगी, जिससे देश की एकता और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गंभीर संकट पैदा हो जाएगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि वित्तीय निगरानी रखने वाले संस्थानों और सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे गुप्त नेटवर्क को पूरी मुस्तैदी और सटीकता से नेस्तनाबूद करना चाहिए। जस्टिस नागप्रसन्न ने कहा कि जब आरोप आर्थिक नुकसान और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हों, तो अदालतों को जांच की राह में रोड़ा अटकाने से बचना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में गहन जांच न केवल कानूनी रूप से सही है, बल्कि देशहित में अनिवार्य भी है।

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