डिजिटल रेप की शिकायत पर FIR न दर्ज करने पर गाजियाबाद पुलिस पर हाईकोर्ट सख्त, DGP को दिए जांच के निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डिजिटल रेप और यौन उत्पीड़न की शिकायत मिलने के बावजूद प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज न करने पर गाजियाबाद पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर और वेव सिटी थाना प्रभारी (SHO) समेत संबंधित पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने एफआईआर रद्द कराने की मांग वाली आरोपी बिल्डर की याचिका को भी खारिज कर दिया।

डीजीपी खुद करेंगे जांच की निगरानी, 4 हफ्ते में मांगी रिपोर्ट

जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने 6 अगस्त को दिए अपने आदेश में राज्य के पुलिस प्रमुख (डीजीपी) को वेव सिटी पुलिस थाने और जिला पुलिस कमान के स्तर पर हुई लापरवाही की जांच की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने का निर्देश दिया। अदालत ने डीजीपी से कहा है कि वे गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर, वेव सिटी थाने के थानाध्यक्ष और अन्य संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब करें कि गंभीर आरोपों के बावजूद तुरंत एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई। डीजीपी को चार सप्ताह के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट व्यक्तिगत हलफनामे के जरिए हाईकोर्ट में पेश करनी होगी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायत मिलने के बाद पुलिस का प्राथमिक कर्तव्य मामला दर्ज कर जांच शुरू करना है। पुलिस शुरुआती चरण में आरोपों की सत्यता तय करने वाली अदालत नहीं बन सकती और न ही जांच का बोझ शिकायतकर्ता पर डाल सकती है।

क्या है पूरा मामला?

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यह मामला गाजियाबाद स्थित एक रियल एस्टेट कंपनी के मालिक और उसकी पूर्व महिला कर्मचारी से जुड़ा है। महिला के अनुसार, कंपनी के मालिक ने मार्च 2026 में अपने दफ्तर के केबिन में कई बार उसके साथ छेड़छाड़ की और डिजिटल रेप की वारदात को अंजाम दिया। इन घटनाओं से परेशान होकर महिला ने 8 अप्रैल को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

इस्तीफे के कुछ ही दिनों बाद, 14 अप्रैल को आरोपी बिल्डर ने महिला के खिलाफ रंगदारी मांगने का मुकदमा दर्ज करवा दिया, जिसके बाद पुलिस ने महिला को गिरफ्तार कर लिया। बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद महिला ने वेव सिटी थाने में यौन उत्पीड़न और धमकी देने की शिकायत दी। इसके बाद 7 जुलाई 2026 को गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को भी लिखित आवेदन भेजा।

सबूत न होने का हवाला देकर पुलिस ने टाल दी थी शिकायत

महिला का आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने उसकी शिकायत पर केस दर्ज करने से मना कर दिया। पुलिस की दलील थी कि महिला ने व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेश नहीं किए हैं। पुलिस ने महिला के आरोपों को रंगदारी के मुकदमे की जवाबी कार्रवाई और बढ़ा-चढ़ाकर बनाई गई कहानी करार दिया था।

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पुलिस के इस रवैये के बाद पीड़ित महिला ने गाजियाबाद के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की अदालत का दरवाजा खटखटाया। मजिस्ट्रेट ने पुलिस को तुरंत मामला दर्ज कर कानून के मुताबिक जांच करने का आदेश दिया।

मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस ने आरोपी बिल्डर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 (रेप), 74 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला), 75(2) (यौन उत्पीड़न), 76 (कपड़े उतारने के इरादे से हमला) और 351(3) (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया। इसी एफआईआर को रद्द कराने आरोपी हाईकोर्ट पहुंचा था, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।

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